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परिश्रम आपको क्या देता है?

आप कहेंगे यह भी क्या अजीब सवाल है लेकिन मैं फिर भी यही कहूंगा कि कि आइए विचार-विमर्श करें कि आखिरकार परिश्रम मनुष्य को क्या देता है ।यह विचार-विमर्श इस लिए जरूरी है कि जब हमें अपने जीवन में इस प्रश्न का उत्तर पता होगा तो शायद हमारे जीवन का अर्थ ही कुछ अलग होगा ।
माइक्रोसॉफ्ट के अध्यक्ष और कम्प्यूटर की दुनिया के नायक बिल गेट्स दुनिया में जहां भी जाते हैं तो लोग उनसे जो एकमात्र सवाल सबसे पहले पूछते हैं वह सवाल यही है कि “उनकी सफलता का राज क्या है? “इसमें मजेदार बात यह है कि बिल गेट्स भी इसका एक ही जवाब देते हैं और वह है “परिश्रम”।जी हां दोस्तों बिल गेट्स इसके आगे कहते हैं कि मेरे पास ऐसा कोई गोपनीय रहस्य नही है जिसके दम पर मुझे कामयाबी मिली है ।यदि इस कामयाबी का कुछ भी रहस्य है तो वह है केवल और केवल परिश्रम ।

सफलता ही नही सोशल वैल्यू भी देता है परिश्रम

अगर आप क्रिकेट के शौकीन हैं या फिर सचिन तेंदुलकर के फैन हैं तो इस तथ्य से परिचित होंगे कि उनके गुरू आचरेकर सर उन्हें अच्छा खेलने यानी आउट न होने के लिए एक सिक्का देते थे ।जब सचिन आउट ही नही होते थे यह सिक्का तभी मिलता था ।सचिन कहते हैं मेरे पास यह सिक्के आज भी संभाल कर रखी गई धरोहर के समान हैं ।
यह कहानी किसी के लिए केवल कहानी है लेकिन जो परिश्रम की ताकत से परिचित हैं उन्हें पता है परिश्रम हमें क्या-क्या देता है ।मुझे पूर्व सीबीआई डायरेक्टर श्री जोगिंदर सिंह जी की एक बात यहां याद आती है इससे आप को पता चल जाएगा कि परिश्रम से क्या क्या मिलता है ।जोगिंदर सिंह कहते हैं मैं साधारण से भी साधारण घर का साधारण छात्र था इस लिए स्कूल मे भी साधारण हैसियत थी मेरी लेकिन परिश्रम की ताकत मुझे तब एहसास हुई जब मैने आईपीएस क्लियर किया तो जो सहपाठी मेरी तरफ मुंह तक नही करते थे वो मुझे माला पहनाने के लिए अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे ।यह सच है कि यदि आप सचमुच ईमानदारी से कुछ भी पाने के लिए प्रयास करते हैं या परिश्रम करते हैं तो आपको समाज बहुत कुछ देता है ।

परिश्रम वास्तव में कहते किसे हैं?

क्या आपने कभी इस पर विचार किया है कि परिश्रम तो सभी करते हैं लेकिन सफलता सभी को नही मिलती ।इसी तथ्य में इस सवाल का जवाब छिपा है कि आखिर परिश्रम कहते किसे हैं और यह परिश्रम किया कैसे जाए ।अगर कोई व्यक्ति दिन भर किसी दीवार को धक्का दे
और शाम तक दीवार में कुछ भी परिवर्तन न कर पाए तो क्या इसे परिश्रम नही कहा जाएगा
जीहां इसे परिश्रम नही कहा जाता ।
परिश्रम किसी सकारात्मक परिवर्तन को प्राप्त करने केलिए सकारात्मक प्रयास को ही कहा जाता है ।न कि बिना सूझबूझ के किए जाने वाले दिशा हीन कार्य को ।
क्या आप जानते हैं भगत सिंह नियमित 13 से 20 घंटे तक काम करते थे ।और अपने क्रांतिवीर साथियों से सदैव कहा करते थे कि कोई भी काम तभी करना चाहिए जब हमें उस काम को करने में प्रसन्नता का आभास हो ।इसे सरल भाषा मे कहें तो रुचि के साथ किया जाने वाला सकारात्मक कार्य ही परिश्रम है ।

परिश्रम और सामाजिक वैल्यू

बड़ी ही सच्ची दोस्ती है परिश्रम और सोशल वैल्यू में ।जब भी कोई व्यक्ति अपनी किसी सार्वजनिक कोशिश में सफल होता है तो समाज उसके परिश्रम की कदर करते हुए उसे सामाजिक मान या मान्यता जरूर प्रदान करता है वहीं बिना लगन और परिश्रम के किए जाने वाले कार्यों में मिली असफलता को समाज कतई मान्यता नही देता ।समाज का सार्वभौमिक सत्य यह है कि सफलता उसे ही मिलती है जो समर्पित भाव से परिश्रम करता है और तभी समाज इस परिश्रम को स्वीकृति प्रदान करके सामाजिक सम्मान प्रदान करता है ।

परिश्रम और सोशल वैल्यू का राज

महात्मा गांधी ने अपनी जीवनी में लिखा है कि दक्षिण अफ्रीका में जब वे पहली बार अदालत में वकालत के लिए खड़े हुए तो जज ने पूछा मैने अपनी पगड़ी क्यों नहीं उतारी तो मैने जवाब दिया महोदय मुझे ऐसा करना अपने लिए अपमान प्रतीत होता है ।और फिर मैने उनका जवाब सुने बिना ही अदालत छोड़ दी थी ।जब मैं बाहर आ गया तो कुछ मेरे ही हिन्दुस्तानी साथियों ने कहा ऐसे मे तो मैं हार जाऊंगा लेकिन मैंने कहा निश्चित रहें मुकदमा हम ही जीतेंगे ।
यहां एक बात उल्लेखनीय है कि गांधी जी की यही दृढता ही परिश्रम की कसौटी है ।जब भी परिश्रम में मानसिक दृढ़ता का समावेश हो जाता है तब परिश्रम चमक जाता है और फिर
सामाजिक वैल्यू मिलने में देर नही लगती ।

परिश्रम आपको क्या क्या देता है?

सच बात तो यह भी है कि परिश्रम आपको केवल सोशल वैल्यू ही प्रदान नही करता बल्कि वह बहुत कुछ और भी देता है ।सवाल उठता है कि परिश्रम आखिर और क्या-क्या देता है तो इसका जवाब कुछ इस तरह पढना चाहिए
परिश्रम करने वाले व्यक्ति से सभी लोग खुश रहते हैं चाहे घर वाले हों या बाहर वाले सभी परिश्रम का सम्मान करते हैं ।परिश्रमी व्यक्ति की सामाजिक छवि हमेशा सकारात्मक होती है
इसलिए याद रखें

मेहनत के बिना सफलता कभी नही मिलती

मेहनत हमेशा योजना बनाकर और व्यवस्थित ढंग से करनी चाहिए

हर काम को एक रचनात्मक पहलू से जोड़ना चाहिए
परिश्रम में आत्मविश्वास तो चाहिए ही समर्पित भाव का भी होना बेहद जरूरी है

अपने काम को कभी छोटा न समझना चाहिए हां इस बात का ख्याल रखना अच्छा होगा कि तमाम योजनाएं बनाने की बजाए एक ही योजना को पूरे मन से आगे बढाना चाहिए

ऐसे लोगो से बचें जिनकी आस्था परिश्रम मे नही हो
दूसरे को खुश करने की बजाय खुद को खुश रखने वाला काम करना चाहिए ।।

धन्यवाद
लेखक :केपी सिंह
15022018

लव अँड करिअर (वँलेटाइन डे स्पेसिअल)

लव एक खूबसूरत अहसास
मानो नरक में भी जन्नत का आभास

आज हर एक युवा इस लव के खुबसुरत दुनिया में रहना चाहता है। लेकिन करिअर की रंगों के बगैर आपकी लव की जन्नत में कभी बहार नही आ सकती।अगर आप बिना रंगो के जन्नत बसाना भी चाहोगे तो वो जॅदा दिनो तक सफल नहीं होती।
अगर आप के पास अच्छा करिअर, पैसा इ. हैं तो आप अपने मन पसंदीदा साथी के साथ अपनी जिंदगी आसानी से बिता पाओगे। मैं यह नहीं कहती की पैसा, करिअर ही सब कुछ है लेकिन इसके बगैर जिंदगी में रंग भरना बेहद मुश्किल है। और यही सच्चाइ हैं।
प्यार की दुनिया इतनी खूबसूरत हैं कि कोई वहा से लौटकर आना ही नहीं चाहते। जब तक आप इस से बाहर निकलना चाहोगे तब तक आप के करिअर के आधे आॅपशन खतम हो जाते हैं। और जिंदगी भर रह जाता है पश्चताप।
इंसान की जिंदगी में यौवन एक ऐसी स्टेज है कि लव और करिअर दोनों चिजे एक साथ करना होता हैं। बहूत कम लोग लव कि बेडियो के साथ करिअर का रासता तय कर पाते है। नही तो जादातर हार मानके मंजिल ही बदल देते हैं।
अगर आप इस खूबसुरत जन्नत में पहुँच ही गये हो तो दोस्तों घबराने की जरूरत नहीं आप इस के साथ भी करिअर बना सकते हो। इतिहास गवाह है प्यार से बड़ी कोइ ताकत नहीं। अगर आप इस रिलेशनशिप में पहुँच ही चुके हैं तो अब आप पीछे हटोगे। आप अपने प्यार को ही अपनी 💪 ताकत बनालो। अगर आप उसे इतना ही प्यार करते हो और उसे खोना नही चाहते हो तो आप दोनों भी आपस में कमिटमेट कर लो। जैसे कि आप पढाई कर रहे हो तो 4/5 घंटे पढने के बाद ही आप उस से बात करोगे या फिर मिलोगे। खुद को एक टारगेट दो वह पूरा किये बिना आप बात नहीं, चॅटिग नहीं करोगे। यह दोनों तरफ से होना चाहिए।
दोस्तों आप अगर सच में उसे बहूत चाहते हो तो आप अपने लिए ना सही पर उससे बात करने के लिए तो भी अपना काम पूरा करोगे। कयोंकि आप उसे खोना नही चाहते। यह कमिटमेट जितना 💯 मजबूत होगा उतना ही अच्छा परिणाम मिलेगा।
धन्यवाद।

Who is the creator of our destiny? हमारे भाग्य का निर्माता कौन है?

यह एक ऐसा स्वाभाविक सवाल है जो किसी न किसी रूप में समाज में सभी लोगो के मन में पाया जाता है ।फिर चाहे वह कोई पढा लिखा प्रफेशनल व्यक्ति हो या फिर कोई दीन दुनिया से बेखबर कोई आम साधारण इन्सान ही क्यों न हो ।हम सभी को यह जानने की उत्सुकता बराबर रहती है कि आखिर मनुष्य के भाग्य का फैसला कौन करता है?

भाग्य का निर्माता बनाम ईश्वर (Creator of destiny versus God)

कुछ लोगों का विचार है कि ईश्वर हमारे भाग्य को पहले से ही लिख देता है अर्थात हमें क्या बनना है या क्या नहीं बनना है यह बहुत कुछ भाग्य के निर्माता उस ईश्वर के हांथ मे है जो हमारे साथ साथ पूरी दुनिया के भाग्य का लेखा-जोखा रखता है ।और हम सब के भाग्य के अनुसार ही हमें जीवन में सफलता और असफलता से रूबरू कराता है ।इस लिए हमें जो भी अच्छा बुरा जीवन प्राप्त हो उसे स्वीकार कर लेना चाहिए ।ईश्वर या फिर अपने भाग्य से बिना किसी शिकायत या शर्त के ।यही हमारा परम कर्तव्य भी है ।

भाग्य का निर्माता बनाम हमारे कर्म (Manufacturer of Destiny vs Our Work)

ईश्वर यद्यपि संसार का मालिक है लेकिन इसके बावजूद कुछ लोगों का मानना है कि यह सच नही है कि ईश्वर हमारे भाग्य का निर्माता है या फिर ईश्वर हमारे भाग्य को पहले से ही तय कर देता है ।इस लिए हमें उसकी इच्छा मानकर अपने भाग्य को स्वीकारते हुए ज्यादा उछल कूद करने की नही सोचना चाहिए ।जो लोग इस विचार धारा को मानते हैं उनका कहना है कि वास्तव में हमारे भाग्य का कोई भी अन्य निर्माता नही होता बल्कि हम स्वयं अपने-अपने भाग्य के मालिक होते हैं ।अर्थात ईश्वर द्वारा नही बल्कि हमारे आचरण और कर्मों के अनुसार हमारे भाग्य का निर्धारण हम स्वयं करते हैं न कि कोई दूसरी अलौकिक शक्ति । (

कर्म वीर और हमारे भाग्य का रहस्य (Karm Veer and the secret of our fate)

इस संसार मे जो भी व्यक्ति अपने कर्तव्य को महत्व देते हैं उनका कहना है कि जो कुछ भी हम मनुष्य का जीवन प्राप्त करने के बाद अच्छा बुरा पाप पुण्य हासिल करते हैं उस सब के लिए हमारा खुद का जीवन ही वास्तव में मालिक होता है न कि ईश्वर ।लेकिन जो लोग ईश्वर को बीच में शामिल करते हैं तो उनका उद्देश्य अपनी ड्यूटी या अपने कर्मों के फल से भागने का होता है ।

हमारे भाग्य का निर्माता और पैंतरेबाजी (Our Destiny Manufacturer and Maneuver)

चूंकि हर मनुष्य को अपने कर्मों पर नही बल्कि
अपने भविष्य के सुखद और अच्छे होने पर ज्यादा ध्यान रहता है इसलिए दुनिया में भाग्य की पैंतरेबाजी का विकास हुआ और यह क्रम सैकड़ों सालों से अबाध चल रहा है ।किसी जमाने में तो राजा-महाराजा बाकायदा राज ज्योतिष रखने के प्रति बेहद संवेदनशील थे और मजेदार बात यह है कि आज भले इसका रूप बदल गया हो लेकिन असलियत जरा भी नही बदली ।आज भी बड़े बड़े राजनेता अभिनेता इसी लकीर के फकीर बनकर भाग्य को जानने के लिए हर क्षण लालायित दिखाई देते हैं ।

भाग्य का फैसला बनाम हमारा भविष्य (Fortune Decision vs Our Future)

यह सच है कि भाग्य हर व्यक्ति के हांथ मे होता है लेकिन हम चूंकि अपनी जिम्मेदारी के एहसास से दूर होते हैं इसलिए भाग्य की कहानी हमें ज्यादा आकर्षित करती है ।
सच कहें तो हम इसी लिए भाग्य जानने के प्रति हर वक्त संजीदा रहते हैं ।लेकिन जिन्हे अपने कर्म और अपने पुरुषार्थ पर भरोसा होता है तो वह भाग्य पर नही अपने खुद के भरोसे पर ज्यादा ध्यान देते हैं ।

लेखक :केपी सिंह
Kpsingh9775@gmail.com
13022018

हम सचमुच किसके गुलाम हैं? ??

Lifehacks :     आप कहेंगे हम तो सन् 1947 में गुलामी से आजाद हो गए थे फिर यह गुलामी और आजादी वाली बात क्यों की जा रही है,  तो दोस्तों मैं आपसे जो कहना चाहता हूं वह उस गुलामी की बात नही है, बल्कि मैं उस गुलामी की बात करना चाहता हूं जिस गुलामी में न केवल भारत वासी शामिल हैं बल्कि अंग्रेजों के साथ साथ पूरी की पूरी तथाकथित विकसित दुनिया ही शामिल है ।

क्या हम गुलाम हो चुके हैं? इस सवाल का जवाब भी देने के पहले आपको लगेगा कि यह भी एक फालतू सवाल है लेकिन दोस्तों इस बार भी मैं आपसे यही कहूंगा कि यह भी झूठ नही बल्कि सोलह आना सच है कि हम और हमारी आने वाली पीढ़ी की गुलामी पूरी तरह से सिद्ध हो चुकी है इसलिए यह पूरी तरह से सच है कि हम गुलाम हो चुके हैं । हम सब सच में इसके हैं गुलाम जी हां दोस्तों हम भारतीय लोग अंग्रेजों के साथ ही पूरी दुनिया की तरह जिसके गुलाम हैं वह कोई देश या कोई दैत्य दानव नहीं बल्कि वह गुलामी है विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की गुलामी ।आप कहेंगे विज्ञान तो हमारे विकास का प्रमाण है इसमें गुलामी कहां से आई तो भाइयो बहनों जरा गौर फरमाने की कृपा करें और कहीं दूर मत जाइए केवल खुद पर एक सर्च निगाह डालिए ।आप हैरान रह जाएंगे कि सुबह से शाम और शाम से सुबह तक हमारा पल पल विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के साथ नही बीतता बल्कि यह बीतना गुलामी की तरह है जो हमें सोते जगते, उठते-बैठते हर वक्त कभी विज्ञान की छाया से दूर ही जाने नही देता ।

बढती विडम्बना और विज्ञान जी हां दोस्तों प्रेम चंद्र की कहानी मंत्र की तरह यद्यपि हम चिकित्सा सुविधा से एक तरफ वंचित नही रहते तो दूसरी तरफ यह विडम्बना नही तो और क्या है कि हम इसी विज्ञान की वजह से ही चिकित्सा की शरण में जाते हैं । क्या आपने महसूस नही किया कि हम जिस गति से अपने आप को विज्ञान का जीता-जागता दास बनाने की की सफल कोशिश कर रहे हैं वह हमारे विनाश का कारण है ।आज का आदमी इसके बावजूद यह सोच तक नही पाता कि विज्ञान हमारे लिए वह शासक बन चुका है जिसके राज्य में कभी सूरज नहीं डूबता ।। सुबह-शाम बस यही कहानी जी हां दोस्तों हम छोटे छोटे उन दैनिक कार्यों के लिए विज्ञान के मोहताज बन चुके हैं जिन्हें हमें अपने शरीर की सुरक्षा के लिए करना चाहिए लेकिन वाह रे इन्सान रोटी बनाने की मशीन, गाय से दूध दुहने की मशीन और तो और अब हम यह भी कर रहे हैं कि यदि हम अपने खाने में विटामिन शामिल नही कर पाते तो विटामिन की गोली ही बना डाली ।यानी आप को विटामिन के लिए नीबू संतरा के पास तक नही जाना पड़ेगा और आपके शरीर को संतरे नीबू से मिलने वाले तत्व गोली खाने से मिल जाएंगे हमें सच में गोली से दुख नही है हमें दुख है तो सिर्फ इससे कि हम विटामिन भी शरीर को उधार ले कर दे रहे हैं ।

निष्कर्ष और हकीकत जिन लोगों को अब भी मेरी बात समझ में न आई हो तो मैं एक बार फिर दोहराना चाहता हूं कि हम जिस गति से अपने छोटे छोटे कामों के लिए हर क्षण विज्ञान के भरोसे रहने के आदी हो गए हैं यह हमारे लिए सामान्य स्थिति न होकर विचारणीय और बेहद गंभीर स्थिति है । तो क्या करें जनाब???? अगर आप भी झुंझलाहट में मुझसे यही सवाल करना चाहते हैं और मुझे विज्ञान का दुश्मन समझते हैं तो सबसे पहले तो यह दोनों विचार त्याग दीजिए फिर सच्चाई और बिना पूर्वाग्रह के सोचिए कि यदि हम अपने दैनिक छोटे छोटे कार्य खुद करेंगे तो मेहनत जरूर लगेगी लेकिन यह भी सोचिए कि तब आपका घर बीमारी से पीड़ित घर नही कहलाएगा बल्कि सुखी सम्पन्न घर कहलाएगा ।।मुझे विज्ञान चाहिए लेकिन इस हद तक नही कि मुझे इसकी सुविधा ही परेशान करने वाली हो ।

धन्यवाद!

लेखक : केपी सिंह

Kpsingh9775@gmail.com

हम प्यार किससे करें?

प्यार को जानें
सवाल बड़ा ही स्वाभाविक है कि हम प्यार किससे करें? लेकिन इससे भी ज्यादा जरूरी यह है कि पहले हम यह जाने कितने आखिर प्यार होता क्या है? आजकल जिसे हम प्यार कहते हैं क्या वही प्यार है या प्यार का मतलब कुछ और होता है ।क्योंकि हम अक्सर यह भी सुनते हैं कि जमाना प्यार का दुश्मन है तो दूसरी तरफ हम यह भी सुनते हैं कि प्यार अनमोल एहसास है ।यहीं पर हमें ठहर कर कुछ सोचने की जरूरत होती है कि प्यार करने या न करने के पहले हम यह जान लें कि प्यार आखिर होता क्या है?

प्यार इसे कहते हैं?

हम जमाने की बात करें तो हमें कभी-कभी यह महसूस होता है कि एक हम उम्र विपरीत लिंग के साथी का सानिध्य ही प्यार है ।अथवा जवान जोड़े का स्वाभाविक लगाव ही प्यार होता है ।लेकिन नहीं दोस्तों प्यार यह नही होता प्यार तो कुछ और ही होता है ।प्यार एक समर्पण है जो बिना शर्त किसी के लिए भी हो सकता है ।वह कोई हम उम्र विपरीत लिंग के प्रति भी हो सकता है तो यह किसी भी व्यक्ति के लिए दिल से निकलने वाली दुआ भी हो सकता है ।क्योंकि प्यार कोई वस्तु नही बल्कि प्यार महज आप के दिल, स्वभाव या आदत का वह मानवीय पहलू होता है जो अपने एहसास मात्र से सकारात्मक ऊर्जा का विकास करता है ।प्यार कोई आकर्षण नही बल्कि प्यार अपनी अंतरात्मा को भली-भांति जानने-समझने की सात्विक प्रवृत्ति मात्र है ।

तो फिर किससे करें प्यार

इस सवाल का बेहद अजीब जवाब है और वह यह है कि प्यार हमें खुद अपने से करने की कोशिश करनी चाहिए न कि किसी और से ।इसका कारण यह है कि जब तक हम अपने आप से प्यार नही करेंगे तब तक हमें सचमुच प्यार की स्वाभाविकता का ज्ञान नही हो सकता और जब तक हमें खुद प्यार का एहसास नही होगा तो भला हम किसी और से प्यार कैसे कर सकते हैं ।हां हम तब प्यार करने का नकली एहसास जरूर कर सकते हैं मगर सच्चा प्यार हम किसी से तभी कर सकते हैं जब हमें खुद अपनी सकारात्मक ऊर्जा से लगाव होगा क्योंकि यह ऊर्जा ही हमारा और हमारे संसार का सबसे बड़ा सत्य है ।

प्यार कब करें?

प्यार कब करें यह सवाल तब पैदा होता है जब प्यार स्वाभाविक नही बल्कि कृत्रिम होता है वर्ना प्यार की उम्र या प्यार का कोई मुहूर्त नही होता ।कुछ लोग कहते हैं पहले अपना कैरियर संभालो फिर प्यार के रास्ते में चलने की कोशिश करना तो ऐसा प्यार दो लोगों के बीच शारीरिक नजदीकी तो ला सकता है लेकिन मानसिक और आत्मीय नजदीकी तब तक नही आती जब हम अपने आप से प्यार करने की कला नही सीख लेते ।

हमारा निष्कर्ष हमारा प्यार

निष्कर्ष और प्यार का तात्पर्य यह है कि हमें पहले खुद से प्यार करने की कोशिश करनी चाहिए ताकि हमें देश दुनिया और समाज की सच्चाई का एहसास हो सके ।हमें किसी और से प्यार की उम्मीद भी तभी लगाना चाहिए जब हम खुद प्यार को किसी को देने या बांटने के काबिल हो जाएं ।

धन्यवाद

लेखक :के पी सिंह
Kpsingh9775@gmail.com
Mobile 9651833983

पकौड़ा शास्त्र की सच्चाई

दोस्तों नमस्कार
यद्यपि मुझे पकौड़ा शास्त्र की शुरूआत में ज्ञान नहीं था इसलिए मैं इस विधा पर कुछ बोलने से घबराता था लेकिन कुछ महान लोगों की कृपा से अब मुझे काफी जानकारी हो गई है जैसे अब मुझे इस बात की भली-भांति ज्ञान हो गई है कि आजकल जितने भी तथाकथित वीर सपूत में इस देश में बड़ौदा बनाने के लिए उत्सुक हैं लगभग सभी उच्च कोटि के नाक प्रतिनिधि हैं।
यानी जो काफी दिनों से इस फ़िरक में बैठे थे कि कुतुर्क का कोई मौका हाथ लग रहा है और हम हमेशा की तरह अपने हवाई फायरिंग शुरू करते हैं तो उनकी यह शानदार उपलब्धि है कि वे अपनी कुतुर्क के झोंके के मार्ग में न केवल ढूंढ ली हैं बल्कि वह अपनी मकसद की मुहेन में झंडा फहरा रहे हैं। ईश्वर की कृपा से आजकल यह बहस काफी गति से गतिशील है

पकौड़ा शास्त्र की विशेषता

सबसे बड़ी विशेषता तो यही है कि यहां पर सभी लोग इस तरह के कथित बहादुर पढ़े गए लोग हैं जो भत्ता की भाषा को समझते हैं परन्तु उद्यमी के कोहरा न तो जानते हैं, न जानना चाहते हैं। परम प्रतापी यह फेसबुक
भक्त जन नौकरी की माला जपते जपटे यह भूल गए कि भत्ता के बरसास काफी पहले खत्म हो गया है।

इस परम आनंद दायक में बहस में पकौड़ा शास्त्र की अगली विशेषता यह है कि यहां वही भटकती आत्मा के इष्ट जन घूम घूमते हुए पिकाड़ा की धूम मचाने की फ़राक में हैं जो पहले तो माँ बाप की कमाई में महज डिग्री कमाया है और आज अपनी डिग्री को देख रहा है देखकर खुश होने की प्रगतिशील चिंता में चिंतित हैं
यह वही कारीगर प्रकार के लोग हैं जो ज़िन्दगी के लिए नौकरी तलाशने के लिए शपथ पत्र के साथ आप सभी को लगभग सभी घूमती गली में इतिहास रचते हुए पाए जाते हैं।

पकौड़ा शास्त्र की नीयत

आने वाले समय में यह पक्वाड़ा विक्रेता कितने और किस प्रकार के पकौड़े बनाकर अपनी डिग्री का सामुदायोग करे तो यह पता नहीं है लेकिन यह इस बात को निश्चित रूप से पता है कि पकौड़ा शास्त्र इन्हें शायद ही कभी दो जून की रोटी कमाई योग्य बनती है पाएगा
दोस्तों पकौड़ा शास्त्र मे कुछ लोग पीएचडी डिग्री होल्डर हैं जिन्होने अपनी जिंदगी में पकौड़ा के अलावा कुछ न तो सोचा है और न ही सोचने का भयंकर इरादा विज्ञापन सक्रिय नहीं है ते हैं।

विडंबना और पक्ड़ा

दोस्तों असली दुर्भाग्य इस देश में काम का संकट नहीं है। बल्कि असली संकट यह देश की बुद्धि है, जिस पर यह डौलती मंडली कुंडली मार कर इस तरह की बात है कि जब मौका मिले और वह रोजगार नहीं है, तो यह सब गलत तर्कों से समाज के समक्ष गीत संगीत के साथ प्रस्तुत कर के कहीं का इट कुछ तो रोड़ा भानुमती ने कुनबा जोड़ा
को बकाइदा साबित किया

पकौड़ा निष्कर्ष

निश्चय यह है कि यह सब लोग जो बक्कोड़ा आंदोलन के हमराही हैं,
रोजगार नहीं हैं लेकिन केवल माला जपाना को जानते हैं। आगे बढ़ने के लिए रोजगार की खोज
या फिर खुद को रोजगार पैदा करना
सोचना तक नही चाहते।

धन्यवाद
लेखक: के पी सिंह
केपीएसिंगह 9775@gmail.com
मोबाइल 9651833 9 83

आओ ज़रा बात करो 

क्या हम विज्ञान और प्रौद्योगिकी के गुलाम बन चुके हैं ? जब बात विज्ञान और प्रौद्योगिकी का हो तो सबसे पहले विज्ञान और प्रौद्योगिकी की बात करना बेहद जरूरी है क्योंकि पहले यह जानना जरूरी है कि यह दोनों एक ही हैं या अलग अलग हैं। जब हम विज्ञान की बात करते हैं तो विज्ञान किसी भी विषय का क्रम बद्ध और सुव्यवस्थित ज्ञान को कहने के लिए, जब बातों की तकनीक बनती है तो हमारा तात्पारी उत्पादन की विधियों से होता है, जिससे वस्तुओं का निर्माण होता है।

यदि हम अपने चारों ओर देखें तो हमें विज्ञान ही विज्ञान चारों तरफ दिखता है। यह सचमुच अच्छा है लेकिन यहां तक ​​कि एक सवाल भी पैदा होता है कि आधुनिक मनुष्य का इस प्रकार केवल और केवल विज्ञान की तकनीक का दम पर अपनी सुबह और अपनी शाम को समर्पित करना मानव हित में उचित है?

इस सवाल का आशय यह है कि हम सुबह से शाम तक जिस तरह दैनिक जीवन के बेहद साधारण कार्य से लेकर प्रोफेशनल कामों तक जिस तरह तकनीक के आदी हो चले हैं क्या यह उचित है? क्या हम एक ऐसे घर की कल्पना कर सकते हैं जिस घर में पंखा कूलर टीवी एसी गीजर लैपटॉप माइक्रोवेव जैसी साधारण चीजें न हों ।

ईमानदारी से जवाब दें तो शायद इसका जवाब होगा बिल्कुल नहीं क्यों कि यह सत्य किसी से छिपा नही रह गया है कि हम प्रकृति प्रदत्त जीवन निरंतर भूलते जा रहे कमाल की बात यह है कि हम फिर भी  बेखौफ अपनी मस्त चाल में मदमस्त हैं ।

हम और हमारा दैनिक जीवन

हम देख सकते हैं कि हमारे चारों तरफ विज्ञान और प्रौद्योगिकी का ही बोलबाला है चाहे वह सुरक्षा व्यवस्था मे प्रयुक्त प्रौद्योगिकी हो या फिर स्वास्थ्य सेवाओं में प्रयुक्त प्रौद्योगिकी हो या फिर शिक्षा में शामिल प्रौद्योगिकी हो या फिर आर्थिक उत्पादन में प्रयुक्त होने वाली प्रौद्योगिकी हो या फिर परिवहन के क्षेत्र की प्रयुक्त प्रौद्योगिकी हो या फिर राजनैतिक क्षेत्र में प्रयुक्त होने वाली प्रौद्योगिकी ही क्यों न हो ।

ध्यान देने की बात यह है कि मेरा तात्पर्य यह नही है कि हमें इन आधुनिक सुविधाओं का फायदा नहीं उठाना चाहिए बल्कि मेरा तात्पर्य यहां केवल यह है कि हमें कबीर दास जी के इस दोहे का स्मरण करना चाहिए

अति का भला न बरसना! अति की भली न धूप!!

आओ बात करें कबीर की सीख की

यहां पर हमारा विवाद का आशय है कि जब से हम खुद को विकसित किया गया है, तब से प्रौद्योगिकी का हवाला दिया, तब से हमारी अपनी शारीरिक विकास प्रभावित है अगर एक तरफ चिकित्सा विज्ञान का फायदा हुआ तो चिकित्सा विज्ञान की ज़रूरत की अनावश्यक दबाव भी मैं झेल रहे हैं

जो जीने की शैली के लिए सच में ज़रूरत है शायद उसे हम या तो छोड़ चुके हैं या छोड़ने वाले हैं। शुक्र से शाम तक केवल तकनीक का बल पर अपना समय गुज़राना वाला शायद भूल गया है  विज्ञान और प्रौद्योगिकी

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लोक प्रिय बनें, मगर कैसे? ??

दोस्तों हम में से सब लोग लोकप्रिय बनना चाहते हैं।शायद ही संसार में कोई ऐसा भी व्यक्ति हो जो लोकप्रिय न बनाना चाहता हो ।सच्चाई यही है कि क्या राजा क्या रंक सभी न केवल लोकप्रिय होना चाहते हैं बल्कि सबसे ज्यादा लोकप्रिय होना चाहते हैं ।हर व्यक्ति अपने-अपने क्षेत्र मे इस कदर प्रसिद्ध होना है कि भले ही इसके लिए उसे कुछ भी करना पड़े ।संसार में कुछ ऐसे भी उत्साहित लोग देखे गए हैं जो अपना नुकसान करने को भी तैयार हैं बस उन्हें कोई प्रसिद्ध होने का सर्टीफिकेट दे दे ।

सवाल उठता है कि क्या यह तरीका प्रसिद्ध पाने के लिए सही है कि हम अपना खुद का नुकसान भी कर लें प्रसिद्ध होने के लिए ? जी नही यह तरीका बिल्कुल सही नही है क्योंकि  इतिहास में जो भी लोकप्रिय लोग हुए हैं उन्होने इस तरीके को अपनाने के बारे मे कभी नही सोचा ।

लोक प्रिय लोग लोकप्रिय यूं ही नहीं बने 

दोस्तों महान लोगों का एक खास गुण होता है और वह है बड़प्पन को बांटना ।उनके सम्पर्क मे जो भी आता है वह उसे अपने आचार विचार से यह समझाने में सफल होते हैं कि उनके लिए आप का बेहद महत्व है ।अर्थात महान लोग जिससे भी मिलते हैं उसकी उतनी ही कदर करते हैं जितने खुद अपने लिए वह उस नए मिलने वाले व्यक्ति से करते हैं ।महान लोग किसी महानता की डिग्री को हासिल नही करते लेकिन वह हर मनुष्य की वैल्यू जरूर करते हैं फल स्वरूप उनके संपर्क में आने वाला हर व्यक्ति उन्हें श्रेष्ठ और महान माने बिना नही रह सकता ।यही है लोकप्रिय बनने की पहली सीढी ।।।दूसरी सीढी के रूप में आप इसे ले सकते हैं कि लोकप्रिय लोग लगभग हर व्यक्ति को अपना समझते हैं मेरा पराया के भाव से बहुत चिपके न होकर बहुत दूर होते हैं ।इसका परिणाम यह होता है कि लोग चाहकर भी उन्हें भूल नही पाते और इस तरह उनकी लोकप्रियता आसमान की बुलंदियों की ओर बढ जाती है ।

लोक प्रिय बनने की ओर 

जी हां दोस्तों महान लोग या लोकप्रिय लोग अपने फायदे के लिए किसी का नुकसान नही करते बल्कि वह अपना घाटा कुबूल करके भी किसी दूसरे को कष्ट या क्षति पहुंचाने के बारे में कभी नही सोचते ।हमारे इतिहास में सैकड़ों उदाहरण हैं जिनके अनुसार जिन लोगों ने इस मिट्टी की दुनिया में अपनी पहचान को बनाए रखा है वह आगे चल कर महान लोगों की श्रेणी में शामिल हुए ।क्योंकि जो इस संसार के तीन तिकड़म से खुद को उबार नहीं पाते उनका खुद का वास्तविक अस्तित्व मिटते देर नही लगती ।।।

सकारात्मक लोक प्रियता और दुनिया 

ध्यान देने की बात है आजकल दो तरह के लोग प्रसिद्ध पाते हैं अथवा लोकप्रियता हासिल करते हैं एक सकारात्मक लोग होते हैं तो दूसरे नकारात्मक लोग होते हैं ।सकारात्मक लोग लोगों की पीड़ा खत्म करते हैं तो नकारात्मक लोग लोगों को हर हाल में पीड़ा देने की फिराक में रहते हैं ।।आप को यह भली-भांति जान लेना चाहिए कि आप सिर्फ सकारात्मक  आचरण से लोकप्रिय बने तभी श्रेष्ठता है वर्ना प्रसिद्ध तो वह बदमाश भी हो जाता है थोड़े दिन के लिए जो किसी दिन पुलिस की गोली का शिकार भी हो जाता है ।।।

धन्यवाद

लेखक

केपी सिंह

Kpsingh 9775 @Gmail. Com

 

 

सुना है कि तू बेवफा हो गया है

दोस्तों
यह मेरी शिकायत आप से नही है और न ही किसी अन्य व्यक्ति से यह मेरी कोई खास शिकायत है बल्कि इसकी सच्चाई यह है कि
वर्तमान में यूपी के भाजपा विधायक जनों की शिकायत है और वह भी प्रदेश सरकार और उसके तमाम बड़े अधिकारियों से ।यह शिकायत कितनी गम्भीर है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि माननीय योगी जी को अपने रूठे हुए और साथ ही तमतमाए हुए माननीयों को समझाने के लिए बाकायदा एक आयोजन करना पड़ा ।इतना ही नहीं सरकार को सम्मान का सम्मन भी अधिकारियों के नाम निकालना पड़ा अर्थात राज्यादेश जारी करना पड़ा ।

अपमान की हकीकत

मामला एक पीड़ा से प्रारंभ होता है ।सरकारी गैर सरकारी विधायकों का कहना है कि जब भी वह जनता के किसी काम से अफसरों से रूबरू होते हैं तो यह अधिकारी
न ही तवज्जो देते हैं और न ही यह सम्मान देते हैं ।।जब कि हम लोकतंत्र की रक्षा करने वाले जनप्रतिनिधि हैं हमें सम्मान और खास तवज्जो मिलने का संवैधानिक अधिकार है
बजट सत्र के पूर्व योगी सरकार ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए सभी माननीयों को यह बताने की कोशिश की है कि वह निश्चित रहें ।आप को तवज्जो और सम्मान सरकारी अधिकारियों से मिलेगा यह
शासन के आदेश के द्वारा सुनिश्चित कर दिया गया है ।

सच के आइने में सामाजिक हकीकत

ध्यान से देखें तो यह पतन की पराकाष्ठा की तरफ बढती एक सामयिक समस्या प्रतीत होती है लेकिन ऐसा नही है।सच यह है कि जिन माननीयों को अधिकारियों से दिक्कत है वह वास्तव में स्वंय ही किसी दिक्कत से कम नही हैं ।यह बात जनता भी जानती है और अधिकारी भी कि वर्तमान में कोई व्यक्ति विधायक अपने सदाचार से नही बनता बल्कि इसके लिए छल बल खल सब की महती भूमिका होती है ।
जो माननीय विधायक बनने के लिए पार्टी को चंदा देने के नाम पर टिकट की ज्यादा से ज्यादा कीमत देते हैं वह कितने सम्मान के पात्र हैं यह जानना बेहद जरूरी है क्योंकि यह लोग सचमुच जनता के प्रतिनिधि नही बल्कि किसी पार्टी के दलाल या एजेंट खुद को ज्यादा साबित करने वाले होते हैं ।
जो अधिकारी अपने जीवन में सिर्फ अपनी मेहनत के बल पर इस प्रतिष्ठित पद पर पहुचा है क्या उसके लिए सम्मान नही व्यक्त किया जाना चाहिए ।जब प्रशासन के
सामने ही जनता के तथाकथित प्रतिनिधि लोकतंत्र के साथ बेहयायी करते हैं तो आप ही बताइए क्या ऐसे लोग किसी से सम्मान की उम्मीद कर सकते हैं

सुना है कि सचमुच तू बेवफा है

सच तो यह है कि आज लोकतंत्र की दुहाई देने वाले इस देश में बहुत कुछ लोकतांत्रिक या सम्मानीय नही है ।जिन लोगों को समाज के सामने खुद को एक उदाहरण के रूप में पेश होना चाहिए वह रातों रात पाला बदल कर बेवफा से वफादार और वफादार से बेवफा बन जाते हैं ।मजे दार यह है कि नेता इसके बाद भी सम्मान का भूखा रहता है यह काबिले तारीफ है ।क्योंकि कोई हिम्मत वाला ही खुद असम्मानित आचरण करके
दुनिया से सम्मान की गारंटी मांग सकता है

सम्मान की लड़ाई मे जीत किसकी होनी चाहिए

सवाल उठना स्वाभाविक है कि इस सम्मान की तथाकथित लड़ाई मे किसे जीत मिलनी चाहिए और किसे सम्मान की लड़ाई में हारना चाहिए ।दोस्तों यह रोचक और ध्यानाकर्षक सवाल है जिसका जवाब भी तलाशना बेहद जरूरी है ।क्योंकि सम्मान सब के लिए बेहद जरूरी है ।राजा हो या रंक बिना सम्मान के सबका जीवन जीवन नही कहलाता ।इसे सरल शब्दों में कहें तो सम्मान सब के जीवन का अपरिहार्य अंग है
जहां तक मेरे दृष्टिकोण की बात है तो वह बिलकुल साफ है और वह यह है कि इस लड़ाई में शामिल दोनों योद्धाओं को सम्मान मिलना चाहिए ।यदि जनप्रतिनिधि जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं तो लोक सेवक भी लोक के प्रतिनिधि हैं और यह भी जनता के लिए ही कार्य सम्पादन करते हैं
काम और महत्व के तल पर आप तभी कुछ खास हो सकते हैं जब आप सचमुच जनता का कल्याण ज्यादा सरल बना रहे हों ।

अगर एक विधायक जो जनता की सेवा के लिए चुना गया है और वह जनविरोधी कार्यों में संलिप्त है तो उसे सम्मान नही सम्मन ही मिलना चाहिए ।ठीक इसी प्रकार जनता की सेवा के लिए सक्षम समझे गए किसी लोक सेवक में यदि अक्षमता पायी जाती है तो वह भी सम्मान नही सम्मन का ही अधिकारी है ।”सुना है कि तू बेवफा हो गया “जैसी खास बहस के निष्कर्ष में इतना ही कहा जा सकता है कि सम्मान पाने का अधिकारी वही है जो खुद सम्मानित आचरण का प्रतिनिधित्व करता हो ।। सुना है कि तू बेवफा हो गया है

धन्यवाद
लेखक :के पी सिंह
Kpsingh 9775@gmail.com
Mobile 9651833983

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भारतीय समाज में पंचायत की व्यवस्था किसी को नहीं है लेकिन नहीं तो यदि हमारे बारे में बात करें तो यह व्यवस्था हमारे देश में वैदिक समय से ही गतिशील हो रहा है।
हां यह सच है कि उनके रूप बदलते हैं.हमारा वर्तमान लोकतंत्र प्रणाली वास्तव में इसी महत्वपूर्ण व्यवस्था का आधुनिकीकरण है जिसका प्रतीक है हमारे राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली में स्थित हमारे सांसद भवन …
लेकिन सवाल उठता है कि क्या सचमुच आज हम जो संसद को पता है, यह हमारे राष्ट्रीय महापंच है?
या फिर क्या सचमुच हमारा संसद सचमुच हमारे लोकतांत्रिक सभ्यता का प्रतिनिधित्व करने के लिए जगह है? ???
इस तरह के हमारे प्रश्नों को पैदा करने का कारण है हमारे वर्तमान लोक सभा का परंपरा लगातार कम होना होगा
आज हालात यह हैं कि हमारे प्रधान मंत्री अपनी महत्वपूर्ण व्याख्यान दे रहे हैं तो हमारे विपक्ष के जिम्मेदार सांसद शोरशराबे में मस्त हैं सलवा भी यह है कि प्रति व्यक्ति करीब दस लाख रुपये खर्च कर रहे हैं इस लोकसभा व्यवस्था में यह बनावट अवरोध आखिर क्यों?
क्या सांसद भवन में बैठे हैं और लाखों जन-समुदाय का प्रतिनिधि क्या सच में अपनी आचरण से देश और देश के जनता के साथ न्याय कर रहे हैं?
प्रश्न यह भी है कि क्या सांसद भवन के अंदर घटित होने वाली इन अनावश्यक गतिविधियों से हमारे राष्ट्रीय महापंचत की गरिमा का छल नहीं होगा।
क्या सचमुच हमारा संसद हमारे महान पंचायत है यह सवाल पैदा हो रहा है एक कारण यह भी है कि हमारे जनप्रतिनिधि लगातार संसदीय आचरण को भी त्याग कर रहे हैं .माम रिपोर्ट यह बताता है कि कभी-कभी संसद भवन में ऐसा विचित्र माहौल भी देखा जब कोई राष्ट्रीय महत्व का विषय में बहस का बयामी कम करने तक पूरा करने का संकट खड़ा हो जाता है।
बदलते समय जनसाधारण की आकांक्षा ही यही है कि हमारे जनप्रतिनिधि ऐसा व्यवहार करना सचमुच हमारे धरोहर सिद्ध हो। मुझे याद है कि एक बार जब पूर्व राष्ट्रपति श्री अब्दुल कालम के मुलाकात एक स्कूल गए थे तो किसी ने ऐसा सवाल किया था कि राष्ट्रपति को जवाब देने में असहजता महसूस भी की थी
जी हां दोस्तों वहां किसी बच्चे ने राष्ट्रपति महोदय से यह पूछा था कि
“सर रोज रोज राजनैतिक प्रतिनिधित्व क गिरते आचरण को देखते हुए हमें बताइए कि हम किसके जैसा बनें ? ?? “
राष्ट्रपति को इस प्रश्न के उत्तर में कठिनाई हुई है कि वहां लगातार गिरते हुए संसद की गरिमा ने खुद को भी यही प्रश्न पैदा किया था कि
क्या सचमुच हमारा संसद देश का सबसे बड़ा पंचायत है? ?
सबसे बड़ा पंचायत कहने का आशय, उसके क्षेत्रफल से नहीं, लेकिन
कथाकार प्रेम चंद्र की सर्वकालिक कहानी पंचायत में वर्णित है कि पंचायत गरिमा से है जिसमें एक कुटिल व्यक्ति की आकांक्षा में मातमी डालकर एक सार्वभौमिक सत्य की प्रतिष्ठा करना गरिमा को स्थापित किया गया था ..
यदि आज यह प्रश्न पैदा हुआ है कि
वास्तव में हमारे पंचायत में हमारा सबसे बड़ा पंचायत है तो इसका जवाब भी हमारे राष्ट्रीय का प्रतीक संसद से ही ौरव आना चाहिए क्योंकि मैंने सुना है कि
सच्चाई का सबसे प्रयोग उसका प्रयोग है न कि उसकी महिमा मंडन …।
धन्यवाद
लेखक: के पी सिंह
Kpsingh 9775@gmail.com
मोबाइल: 9652833983
08022018

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