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परिश्रम आपको क्या देता है?

आप कहेंगे यह भी क्या अजीब सवाल है लेकिन मैं फिर भी यही कहूंगा कि कि आइए विचार-विमर्श करें कि आखिरकार परिश्रम मनुष्य को क्या देता है ।यह विचार-विमर्श इस लिए जरूरी है कि जब हमें अपने जीवन में इस प्रश्न का उत्तर पता होगा तो शायद हमारे जीवन का अर्थ ही कुछ अलग होगा ।
माइक्रोसॉफ्ट के अध्यक्ष और कम्प्यूटर की दुनिया के नायक बिल गेट्स दुनिया में जहां भी जाते हैं तो लोग उनसे जो एकमात्र सवाल सबसे पहले पूछते हैं वह सवाल यही है कि “उनकी सफलता का राज क्या है? “इसमें मजेदार बात यह है कि बिल गेट्स भी इसका एक ही जवाब देते हैं और वह है “परिश्रम”।जी हां दोस्तों बिल गेट्स इसके आगे कहते हैं कि मेरे पास ऐसा कोई गोपनीय रहस्य नही है जिसके दम पर मुझे कामयाबी मिली है ।यदि इस कामयाबी का कुछ भी रहस्य है तो वह है केवल और केवल परिश्रम ।

सफलता ही नही सोशल वैल्यू भी देता है परिश्रम

अगर आप क्रिकेट के शौकीन हैं या फिर सचिन तेंदुलकर के फैन हैं तो इस तथ्य से परिचित होंगे कि उनके गुरू आचरेकर सर उन्हें अच्छा खेलने यानी आउट न होने के लिए एक सिक्का देते थे ।जब सचिन आउट ही नही होते थे यह सिक्का तभी मिलता था ।सचिन कहते हैं मेरे पास यह सिक्के आज भी संभाल कर रखी गई धरोहर के समान हैं ।
यह कहानी किसी के लिए केवल कहानी है लेकिन जो परिश्रम की ताकत से परिचित हैं उन्हें पता है परिश्रम हमें क्या-क्या देता है ।मुझे पूर्व सीबीआई डायरेक्टर श्री जोगिंदर सिंह जी की एक बात यहां याद आती है इससे आप को पता चल जाएगा कि परिश्रम से क्या क्या मिलता है ।जोगिंदर सिंह कहते हैं मैं साधारण से भी साधारण घर का साधारण छात्र था इस लिए स्कूल मे भी साधारण हैसियत थी मेरी लेकिन परिश्रम की ताकत मुझे तब एहसास हुई जब मैने आईपीएस क्लियर किया तो जो सहपाठी मेरी तरफ मुंह तक नही करते थे वो मुझे माला पहनाने के लिए अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे ।यह सच है कि यदि आप सचमुच ईमानदारी से कुछ भी पाने के लिए प्रयास करते हैं या परिश्रम करते हैं तो आपको समाज बहुत कुछ देता है ।

परिश्रम वास्तव में कहते किसे हैं?

क्या आपने कभी इस पर विचार किया है कि परिश्रम तो सभी करते हैं लेकिन सफलता सभी को नही मिलती ।इसी तथ्य में इस सवाल का जवाब छिपा है कि आखिर परिश्रम कहते किसे हैं और यह परिश्रम किया कैसे जाए ।अगर कोई व्यक्ति दिन भर किसी दीवार को धक्का दे
और शाम तक दीवार में कुछ भी परिवर्तन न कर पाए तो क्या इसे परिश्रम नही कहा जाएगा
जीहां इसे परिश्रम नही कहा जाता ।
परिश्रम किसी सकारात्मक परिवर्तन को प्राप्त करने केलिए सकारात्मक प्रयास को ही कहा जाता है ।न कि बिना सूझबूझ के किए जाने वाले दिशा हीन कार्य को ।
क्या आप जानते हैं भगत सिंह नियमित 13 से 20 घंटे तक काम करते थे ।और अपने क्रांतिवीर साथियों से सदैव कहा करते थे कि कोई भी काम तभी करना चाहिए जब हमें उस काम को करने में प्रसन्नता का आभास हो ।इसे सरल भाषा मे कहें तो रुचि के साथ किया जाने वाला सकारात्मक कार्य ही परिश्रम है ।

परिश्रम और सामाजिक वैल्यू

बड़ी ही सच्ची दोस्ती है परिश्रम और सोशल वैल्यू में ।जब भी कोई व्यक्ति अपनी किसी सार्वजनिक कोशिश में सफल होता है तो समाज उसके परिश्रम की कदर करते हुए उसे सामाजिक मान या मान्यता जरूर प्रदान करता है वहीं बिना लगन और परिश्रम के किए जाने वाले कार्यों में मिली असफलता को समाज कतई मान्यता नही देता ।समाज का सार्वभौमिक सत्य यह है कि सफलता उसे ही मिलती है जो समर्पित भाव से परिश्रम करता है और तभी समाज इस परिश्रम को स्वीकृति प्रदान करके सामाजिक सम्मान प्रदान करता है ।

परिश्रम और सोशल वैल्यू का राज

महात्मा गांधी ने अपनी जीवनी में लिखा है कि दक्षिण अफ्रीका में जब वे पहली बार अदालत में वकालत के लिए खड़े हुए तो जज ने पूछा मैने अपनी पगड़ी क्यों नहीं उतारी तो मैने जवाब दिया महोदय मुझे ऐसा करना अपने लिए अपमान प्रतीत होता है ।और फिर मैने उनका जवाब सुने बिना ही अदालत छोड़ दी थी ।जब मैं बाहर आ गया तो कुछ मेरे ही हिन्दुस्तानी साथियों ने कहा ऐसे मे तो मैं हार जाऊंगा लेकिन मैंने कहा निश्चित रहें मुकदमा हम ही जीतेंगे ।
यहां एक बात उल्लेखनीय है कि गांधी जी की यही दृढता ही परिश्रम की कसौटी है ।जब भी परिश्रम में मानसिक दृढ़ता का समावेश हो जाता है तब परिश्रम चमक जाता है और फिर
सामाजिक वैल्यू मिलने में देर नही लगती ।

परिश्रम आपको क्या क्या देता है?

सच बात तो यह भी है कि परिश्रम आपको केवल सोशल वैल्यू ही प्रदान नही करता बल्कि वह बहुत कुछ और भी देता है ।सवाल उठता है कि परिश्रम आखिर और क्या-क्या देता है तो इसका जवाब कुछ इस तरह पढना चाहिए
परिश्रम करने वाले व्यक्ति से सभी लोग खुश रहते हैं चाहे घर वाले हों या बाहर वाले सभी परिश्रम का सम्मान करते हैं ।परिश्रमी व्यक्ति की सामाजिक छवि हमेशा सकारात्मक होती है
इसलिए याद रखें

मेहनत के बिना सफलता कभी नही मिलती

मेहनत हमेशा योजना बनाकर और व्यवस्थित ढंग से करनी चाहिए

हर काम को एक रचनात्मक पहलू से जोड़ना चाहिए
परिश्रम में आत्मविश्वास तो चाहिए ही समर्पित भाव का भी होना बेहद जरूरी है

अपने काम को कभी छोटा न समझना चाहिए हां इस बात का ख्याल रखना अच्छा होगा कि तमाम योजनाएं बनाने की बजाए एक ही योजना को पूरे मन से आगे बढाना चाहिए

ऐसे लोगो से बचें जिनकी आस्था परिश्रम मे नही हो
दूसरे को खुश करने की बजाय खुद को खुश रखने वाला काम करना चाहिए ।।

धन्यवाद
लेखक :केपी सिंह
15022018

असफलता के तर्क न दें

मैने तो देखें हैं ऐसे व्यक्ति आपने भले ही न देखे हों,जो पहले तो खुद को महान ग्यानी मानने की गलती बड़ी सिददत से करते हैं फिर कामचोरी सहित तमाम मूर्खतापूर्ण आचरण करते हैं और जब बाद में उनके हांथ सफलता की बजाए असफलता आती है तो अपनी असफलता को स्वीकार करके पुन: ईमानदारी से प्रयास करने की बजाय अपनी असफलता के पक्ष में ही तथाकथित तर्क देने लगते हैं ।ऐसे लोगों के बारे मे कुछ अधिक जानने के लिए आइए इस लेख को विचार पूर्वक पढें।हम इस लेख में यह देखेंगे कि वह असफल होने के बावजूद भी किस चालाकी से अपनी मूर्खतापूर्ण सोच को अपने साथ साथ समाज पर भी लागू करने की कोशिश करते हैं ।

अपना तो वक्त खराब है

जी हां दोस्तों जिन लोगों की बात मैं यहां करना चाहता हूं उनका पहला तर्क यही होता है कि अपना तो वक्त खराब है वर्ना हम भी बता देते कि हम चीज क्या हैं ।जब कि हकीकत यही होती है कि वह कोई चीज ही नही होते ।सच पूछिए तो अपनी असफलता के बाद उसे सफलता में बदलने की बजाए जो जीवन भर असफल रहने की कोशिश करते हैं वही यह सब घटिया तर्क देते हैं क्योंकि या तो वक्त किसी का नही होता या फिर सबका होता है
वक्त वास्तव में उसी का होता है जो सचमुच वक्त का होता है ।अर्थात वक्त की जरूरत के हिसाब से जो अपने आचरण में परिवर्तन करना जानता वक्त सी का होता है या फिर उसी का साथ देता है ।

अपना कोई बैक या जैक नही है

अपनी असफलता के भी तर्क खोजने वाले कुछ बहादुर जन इस जुमले का भी भरपूर दोहन करते हैं ।यानी जब भी आप इनकी असफलता के कारण पूछेंगे तो यह दुनिया के नायाब नायक अपनी कोई कमी तलाशने की बजाय यही कहते पाए जाते हैं कि यदि हमारा भी कोई गॉडफादर होता या फिर अपनी भी कोई बैकअप पावर होती तो वह धरती उलट देते ।ऐसे लोग अपने को सदा दीन हीन ही घोषित करते हैं अर्थात यही सिद्ध करने की भरसक कोशिश करते हैं कि वह भी विश्व विजयी होते यदि उनकी भी कोई जान पहचान या जैक पावर होती ।यह लोग कभी भूलकर भी असफलता के वास्तविक कारण अर्थात अपनी गलती की तरफ न तो ध्यान देते हैं और न ही ध्यान दिलाने पर भी उसे पहचानते हैं ।यह एनकेनपरकारेण बस यही सिद्ध करना चाहते हैं कि आप जिसे सफल कहते हैं वह जैक या बैक से सफल है ।अगर यह जैकबैक की पावर इनके पास भी होती तो असली सफलता इन्हें ही मिलने वाली थी ।

किस्मत से ज्यादा और किस्मत से पहले

असफलता के झूठे तर्क गढने वाले इस तथ्य को जरूर आप के सामने प्रस्तुत करते हैं कि चूंकि किस्मत से ज्यादा और समय से पहले सफलता किसी को नही मिलती इसी लिए उन्हें भी इसी वजह से सफलता नही मिली ।कोई उनसे यदि यह जानने की कोशिश करे कि आखिर उनकी किस्मत और समय कब उन्हें सफलता दिलाएंगे तो वह यही कहेंगे कि यही तो राज है असली दुनिया का ।अब इन को कौन बताए कि किस्मत से ज्यादा और समय से पहले का तथाकथित घटिया तर्क किसी और ने नही आलसी और कामचोरी मे माहिर सत्यानाशी टाइप के लोगो की यह महान खोज है जो इनकी जुबान से कभी सपने में भी जुदा नही होती ।

सदाबहार जुमले और असफलता के तर्क

आप असफल लोगों से मिलिए आपको ज्यादा मेहनत कतई नही करनी पड़ेगी आप को शीघ्र ही पता चल जाएगा कि आप किस महान हस्ती से मिल रहे हैं ।सच कहें तो असफल लोग दिमागी जड़ता का शिकार होते हैं ।मजेदार बात तो यह है कि जो व्यक्ति जितना ज्यादा असफल होता है वह उतनी ही असाध्य जड़ता का शिकार होता है ।मैं तो आप को यही कहूंगा कि आप कभी-कभी खुद भी चेक कर लिया करें कहीं आप के आसपास कहीं ऐसे ही किसी महानतम हस्ती वास तो नही है ।

असफलता के तर्क के बीच सफलता का रास्ता

इसका तात्पर्य यह है कि यदि आप वास्तव में अपने प्रयास में ईमानदारी से लगे हैं तो चिन्ता की कोई बात नही है ।असफलता से बचने का एक ही तरीका है कि असफल लोग सफल लोगों की तरफ देखें ।सफल लोगों से प्रेरणा प्राप्त करें ।और सबसे अनमोल बात यह है कि जो भी असफल हैं और सफल होना चाहते हैं तो उन्हें सबसे पहले किसी दूसरे की सफलता का सम्मान करना सीखना चाहिए ।

धन्यवाद
लेखक : के पी सिंह
15022018

लोकप्रिय सोशल साइट्स यू ट्यूब की दास्तान

दोस्तों यहां चर्चा यू ट्यूब की होनी है लेकिन मैं इससे भी पहले आपको यह बताना चाहता हूं कि चूंकि यू ट्यूब एक सोशल नेटवर्किंग साइट है इसलिए आइए सबसे पहले यह जानने की कोशिश कि आखिरकार यह सोशल नेटवर्किंग साइट्स क्या होती हैं ?
सोशल नेटवर्किंग साइट्स लोगों को आपस मे जोड़ने वाली दूर संचार प्रणाली हैं ।इन्टरनेट के वर्तमान के दौर में इनकी बेहद अहम भूमिका से नकारा नही जा सकता ।क्योंकि इनके ही माध्यम से आज हम विश्व के किसी भी कोने में स्थित किसी भी व्यक्ति से पलक झपकते ही संपर्क साध सकते हैं ।
वर्तमान में प्रमुख सोशल नेटवर्किंग साइट्स में शामिल हैं फेसबुक, ट्विटर, आरकुट,यू ट्यूब, लिंक्ड इन,ब्लाग एवं चैट आदि ।तो आइए आज यू ट्यूब के बारे मे कुछ और भी जानते हैं क्योंकि कि हमारे इस नायाब
सोशल मीडिया साथी ने अपनी उम्र के 13 साल पूरे किए हैं आज ।

13 साल का हमारा साथी यू ट्यूब

जी हां दोस्तों लोकप्रिय वीडियो शेयरिंग वेबसाइट
यू ट्यूब को आज यानी 14 फरवरी 2018 के दिन तेरह साल पूरे हो रहे हैं ।आज ही के दिन सन 2005 मे पेपल कंपनी के तीन कर्मचारियों ने इसकी जिस जोश और जज्बे के साथ शुरुआत की थी आज यह वही नायाब दिन है ।आज यू ट्यूब को करोड़ों लोग यूज करते हैं और विज्ञान के इस अद्भुत चमत्कार को सलाम करते हैं ।

कहानी यू ट्यूब की

यू ट्यूब एक साझा वीडियो वेबसाइट है ।जहां उपयोग कर्ता वेबसाइट को देख सकता है ।वीडियो अपलोड कर सकता है एवं वीडियो क्लिप को साझा भी कर सकता है ।यू ट्यूब की स्थापना 2005 मे हुई थी ।इस बेहतरीन बेवसाइट को बनाने वाले तीन लोग हैं जिनके नाम हैं बांग्लादेश मूल के जर्मन-अमेरिकी श्री जावेद करीम,ताइवान मूल के स्टीव सेन और अमेरिकी चाड हर्ले ।दरअसल यह लोग वीडियो शेयरिंग और वीडियो देखने का सर्वसुलभ और आसान उपाय हासिल करना चाहते थे ।

14 फरवरी और यू ट्यूब की मोहब्बत

चूंकि यू ट्यूब डाट काम को 14 फरवरी से प्रारंभ किया गया था इसलिए इसका प्रेम के खास दिन वेलेंटाइन डे से भी इन्टरनल कनेक्शन बिठाया जा सकता है ।क्यों कि आज यू ट्यूब से प्यार किए बिना कोई रह ही नही सकता ।यू ट्यूब का शुरुआती मुख्यालय कैलीफोरनिया के सैनमैटियो मे स्थित एक जापानी रेस्तरां की इमारत के ऊपरी हिस्से मे था ।लेकिन आज इसका मुख्यालय कैलीफोरनिया के सैन ब्रूनो मे स्थित है ।इसकी मौजूदा CEO सुसैन वोजसिकी हैं ।

यूट्यूब और कुछ नायाब तथ्य

यू ट्यूब पर पहला वीडियो 23 अप्रैल 2005 को इसके सह संस्थापक जावेद करीम ने जारी किया था ।”मी एट द जू”नामक यह वीडियो केवल 19 सेकंड का था ।जिसे तब सैनडियागो चिड़िया घर में बनाया गया था ।

यूट्यूब पर प्रति मिनट 400 घंटे के वीडियो अपलोड किए जाते हैं ।यानी एक मिनट के अंदर इतने वीडियो अपलोड होते हैं जिनकी समय की गणना की जाए तो उन सब वीडियोज का कुल समय 400 घंटे होगा ।

13 साल के यूट्यूब के रोचक तथ्य

यू ट्यूब आज विश्व की 75 से भी ज्यादा भाषाओं में गतिमान है ।
विश्व का लगभग हर इंटर नेट यूज करने वाला यूजर इस प्लेटफार्म पर प्रतिदिन 40 मिनट व्यतीत करता है
इन्टरनेट चलाने वाली पीढ़ी के 95% तक यू ट्यूब की पहुंच है जो इस बात का संकेत है कि इस 13 साल के नायाब नायक ने हम सब को लुभाया है ।
गूगल के बाद यू ट्यूब सबसे बड़ा सर्च इंजन है
यू ट्यूब पर अपलोड 100 वीडियोज को एक अरब बार से अधिक देखा गया है ।
कारलोज पेरेज द्वारा निर्देशित म्यूजिक वीडियो “डेसपैसिटी”को सर्वाधिक बार यानी 4•82अरब बार देखा गया है ।
ईरान चीन और उत्तर कोरिया में यह यानी यू ट्यूब प्रतिबंध है ।
इसका मतलब यह हुआ कि आप यदि वहां रहते हैं तो आपको यह सुविधा चाहकर भी नही मिलेगी ।

तो मेरे प्यारे दोस्तों यह थी चर्चा यू ट्यूब के 13 साल के होने की ।आशा है आपको जरूर अच्छी लगी होगी ।

धन्यवाद
लेखक :के पी सिंह
14022018

जी हां दोस्तो
मैं कुछ लिखूं ।इसके पहले मुझे एक शेर याद आ रहा है ।
लोग कहते हैं कि हम दुनिया बदल देंगे
एक हम हैं नाम तक बदला नही जाता
लेकिन आज यहां पर मैं जिसकी बात करना चाहता हूं वह इस शेर में फिट नही बैठते थे क्योंकि कि वह उन बेचारे लोगों में नही थे जिनके लिए यह शेर लिखा गया था ।
वह सचमुच बहादुर थे,महान थे।शायद यही कारण था कि उन्हें अपने जीवन में जो भी अच्छा लगा उसे वह अपनी इच्छा शक्ति से पाकर रहे ।

द ग्रेटेस्ट कौन थे?

यह बहुत ही रोचक और सराहनीय है कि विश्व विख्यात अमेरिकी मुक्केबाज मुहम्मद अली को अपना नाम ही जब पसंद नही आया तो उन्होंने
इसे ही बदल दिया और अपने मूल नाम जो था “कैसियस मरसेलुस क्ले जूनियर”को छोड़कर नया नाम मुहम्मद अली रख लिया और चूंकि वह खुद को ही बहुत ज्यादा प्यार करते थे इसलिए अपने इस नये नाम मुहम्मद अली के आगे “द ग्रेटेस्ट”जोड़ दिया ।इस प्रकार उनका नया नाम “मुहम्मद अली द ग्रेटेस्ट” हो गया ।लोगों ने जब इस नाम परिवर्तन की असली वजह पूछी तो उन्होंने बिना किसी लागलपेट या संकोच के साफ साफ कहा था कि उन्हे अपने से गुलामी की बू आती थी इसलिए उन्होंने इस गुलामी को ही मिटा दिया है ।क्योंकि मुझे गुलामी पसंद नहीं ।

“द ग्रेटेस्ट” के द ग्रेट कारनामे

जिस तरह मुहम्मद अली खुद को द ग्रेटेस्ट कहते थे उसी तरह उनके ग्रेट कारनामे भी थे अंतरराष्ट्रीय महान मुक्केबाज मुहम्मद अली ने निहायत विपरीत परिस्थितियों मे खुद को महान बनाने में सफलता प्राप्त की थी ।यह बात दीगर है कि 4जून 2016 को अमेरिकी शहर फीनिक्स में जीवन भर हार न मानने वाला महान मुक्केबाज पार्किन्सन से हार गया था ।और अपने पीछे छोड़ गया था लाखों लाख उन बातों को जो उन्हें महान बनाने में मदद करती हैं ।वह कितने महान थे आप इस बात का अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि क्रिकेट के भागवान तेंदुलकर ने जब इन्हें श्रद्धापूर्वक अंतिम विदाई दी थी तो कहा था कि मुझे जिन बातों का जीवन भर अफसोस रहेगा उनमें बहुत कम बाते हैं और जो हैं भी उनमें सबसे खास बात यह है कि मैं मुहम्मद अली से मिलने को तरसता रह गया और वे असमय चल बसे ।

क्यों थे ग्रेट मुहम्मद अली द ग्रेटेस्ट?

विश्व मुक्केबाजी के नायाब हीरे मुहम्मद अली यूं ही सिर्फ नाम के ग्रेट नही थे बल्कि वे सचमुच काम के भी ग्रेट थे ।12 साल की उम्र में मुक्केबाजी शुरू करने वाले ग्रेटेस्ट ने महज 22 साल की उम्र मे इतिहास का उलटफेर करते हुए 1964 में सोनी लिसटन को हराकर विश्व हैवीवेट चैम्पियन का खिताब जीत लिया था ।और हां इसी जीत के बाद उन्होने अपना नाम भी बदल डाला था।सन 1964 के बाद उन्होने 1974और1978मे भी इस खिताब को अपने नाम किया था ।

सिर्फ तन से नही मन से भी मजबूत थे ग्रेटेस्ट

जी हां दोस्तों मुहम्मद अली सिर्फ मुक्के से ही मजबूत नही थे वह मन से भी बेहद मजबूत थे
इसका प्रमाण यह है कि जब उन्होंने अमेरिकी सेना में भर्ती होने से इन्कार कर दिया था तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था लेकिन वह चूंकि वियतनाम युद्ध के खिलाफ थे इसलिए टूटे नही बल्कि अपनी जिंदगी में आए इन काले दिनों में भी उजाले को तलाशते रहे ।अमेरिकी सेना में भर्ती न होने के कारण उन्हें केवल गिरफ्तार ही नही किया गया बल्कि उनका हैवीवेट टाइटल भी छीन लिया गया था ।इस लिए वह चार साल तक फाइट भी नही कर सके बावजूद इसके युद्ध विरोधी व रंगभेद पीड़ित उन्हें अपना हीरो मानते थे ।यह तो ईश्वर की कृपा थी कि सन 1971 में अमरिकी सुप्रीम कोर्ट ने उनकी सजा पलट दी और ग्रेटेस्ट को न्याय मिला ।

अद्भुत ग्रेटेस्ट उर्फ जिन्दा दिल जिन्दाबाद

छह फीट तीन इंच लम्बे मुहम्मद अली ने अपने जीवन में कुल 61 फाइट में भाग लिया ।इन फाइटो में वह 56 में विजयी रहे थे ।विशेष बात यह है कि इन 56 फाइट में 37 का फैसला नाक आउट के जरिए हुआ था ।वह यदि अपने फैसले के प्रति कठोर थे तो अपने राष्ट्रीय कर्तव्य के लिए समर्पित भी थे ।उन्होने ईराकी राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन से अपने देश के पनदरह लोगो को छुड़ाने के लिए मुलाकात भी की थी।
उनकी अद्भुत जिजीविषा का एक और प्रमाण तब मिला था जब उन्हें अटलांटा ओलम्पिक मे मशाल जलाने के लिए आमंत्रित किया गया था ।सोचा जा रहा था कि शायद वह अपने स्वास्थ्य कारणों से इस कार्य को सम्पन्न करने के लिए उपलब्ध न हो सकें लेकिन दुनिया उस समय स्तब्ध रह गई जब द ग्रेट ने अपने कांपते हुए हांथों से मसाल जला कर अपने ग्रेट होने का प्रमाण दे दिया था ।

धन्यवाद
लेखक :केपी सिंह
15022018

ब्लैक बॉक्स का आविष्कार किसने किया था?

महान उपलब्धि है ब्लैक बॉक्स

दोस्तों या तो आपने खुद विचार किया होगा या फिर किसी ने आप से पूछा होगा कि जब भी दुनिया के किसी कोने में विमान हादसा हो जाता है तो सबसे पहले यही प्रयास क्यों किया जाता है कि ब्लैक बॉक्स को सबसे पहले सुरक्षित रखने की बात क्यों की जाती है ?
लेकिन यदि इस विषय मे आपने किसी से या आप से किसी ने नही भी पूछा तो भी आपके मन में यह जिज्ञासा जरूर होगी कि आखिर ब्लैक बॉक्स की हकीकत क्या है
दोस्तों आप निश्चित रहें आप को आज यह जानकारी मैं अपनी अगली पंक्तियों मे ही देने वाला हूं कुछ इस तरह,,,,

ब्लैक बॉक्स और डेविड वारेन

जी हां दोस्तों आज जिस ब्लैक बॉक्स की हम यहां चर्चा कर रहे हैं उसका आविष्कार आस्ट्रेलिया के महान साइंटिस्ट डेविड वारेन ने सन 1950 के दशक में किया था ।वारेन मेलबोर्न के एरोनाटिकल रिसर्च लेबोरेट्रीज में काम करते थे ।संयोग से उसी समय पहला जेट आधारित कामर्शियल एयरक्राफ्ट “कामैट” दुर्घटना ग्रस्त हो गया था ।वारेन दुर्घटना की जांच करने वाली टीम में शामिल थे ।
तभी उनके मन में एक ख्याल आया कि क्यों न कोई ऐसा यंत्र हो जो विमान हादसे के बाद काफी समय तक दुर्घटना के कारणों को सहेज कर रखे ।।
सच कहें तो ब्लैक बॉक्स अर्थात फ्लाइट डाटा रिकॉर्डर के निर्माण का कार्य तभी प्रारंभ हुआ था ।इसके बाद वह दिन भी आया जब आस्ट्रेलिया को विश्व में प्रथम बार कामर्शियल एयरक्राफ्ट में ब्लैक बॉक्स या फिर फ्लाइट डाटा रिकॉर्डर लगाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ ।
और इस तरह दुनिया में ब्लैक बॉक्स का जन्म हो गया

ब्लैक बॉक्स वास्तव में क्या है?

किसी विमान हादसे की वजह का पता लगाने में दो डिवाइस बेहद महत्वपूर्ण होते हैं ।एक है एफडीआर यानी फ्लाइट डाटा रिकार्डर और दूसरा है सीवीआर यानी कॉकपिट वाइस रिकार्डर ।इसे ही ब्लैक बॉक्स कहा जाता है ।एक में कॉकपिट के अंदर की बातचीत रिकॉर्ड होती है तो दूसरी डिवाइस या सीवीआर में विमान से जुड़े आंकड़े जुटाए जाते हैं ।
ब्लैक बॉक्स का एक रोचक तथ्य यह है कि इसका रंग काला नही होता बल्कि इसका रंग नारंगी होता है ।ब्लैक बॉक्स में पानी और आग का कोई असर नहीं होता ।और तो और 20 हजार फुट दूर से इसका पता लगाया जा सकता है ।यद्यपि ब्लैक बाक्स की बैट्री केवल तीस दिन तक चलती है लेकिन इसके डाटा को सालों-साल रखा जा सकता है।

ब्लैक बॉक्स कुछ खास

ब्लैक बॉक्स को विमान मे पिछले हिस्से में लगाया जाता है ।क्यों कि यह दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना की स्थिति में यहां सबसे ज्यादा सुरक्षित होता है ।ब्लैक बॉक्स को कई महत्वपूर्ण टेस्ट से गुजरना पड़ता है ।उदाहरण के तौर पर ब्लैक बॉक्स रिकार्डर L3FA2100 ग्यारह सौ डिग्री सेल्सियस फायर में कई घंटे और 260 डिग्री सेल्सियस हीट में 10 घंटे तक रह सकता है ।
इतना ही नहीं यह माइनस 55से 70 डिग्री सेल्सियस तापमान पर भी बिना किसी रुकावट के काम करता है ।1960 में आस्ट्रेलिया पहला ऐसा देश था जहां विमानों में ब्लैक बॉक्स लगाना सख्त अनिवार्य था ।जहां तक बात भारत की है तो यहां नागर विमानन महानिदेशालय के नियमों के अनुसार 1जनवरी 2005 से सभी विमानों और हेलीकॉप्टरों में FDR तथा CVC का लगाया जाना अनिवार्य किया गया था ।

दुर्घटना के बाद
ब्लैक बॉक्स की प्राप्ति

हादसे के बाद जब विमान का ब्लैक बॉक्स मिल जाता है तो विशेषज्ञ उसे सीधा लैब ले जाते हैं।इसके बाद हादसे के कारणों की सूक्ष्म जांच की जाती है ।जिन यंत्रों इसमे महत्वपूर्ण भूमिका होती है उनमें प्रमुख हैं टावेड पिंगर लोकेटर25और ब्ल्यूफिन21 ।लोकेटर25 सिग्नल को 6000 मीटर तक की गहराई से ढूंढ लेता है तो वहीं ब्ल्यूफिन21 4500 मीटर की गहराई से ब्लैक बॉक्स को ढूंढ कर लाता है ।ध्यान रहे ब्ल्यूफिन21 को अंडर वाटर ड्रोन भी कहा जाता है ।

ब्लैक बॉक्स कुछ खास

ब्लैक बॉक्स में दुर्घटना से 25 घंटे पहले तक का रिकॉर्ड होता है
ब्लैक बॉक्स में अंडर वाटर लोकेटिअंग डिवाइस होती है जो 14000 फीट नीचे से सिग्नल भेज सकती है
ब्लैक बॉक्स को धातु के चार लेयर या परत में रखा जाता है
ब्लैक बाक्स की चार लेयर इस प्रकार होती हैं
एल्युमीनियम,सूखा बालू,स्टेनलेस स्टील और सबसे बाद मे टाइटेनियम ।
ब्लैक बॉक्स कॉकपिट के अंदर होने वाली सभी बातचीत,रेडियो कम्युनिकेशन, उड़ान का विवरण जैसे स्पीड, इंजन की स्थिति, हवा की गति, विमान की उंचाई, रडार की स्थिति आदि को रिकॉर्ड करता है ।

धन्यवाद
लेखक :के पी सिंह
13022018

दुनिया को स्मार्ट बनाने वाले खास आविष्कार भाग -3

दोस्तों अब हम अपने लेख “दुनिया को स्मार्ट बनाने वाले खास आविष्कार” की तीसरी कड़ी में आ गए हैं।इसलिए यहां पर हम कुछ और चर्चा न करके सीधे अपने लेख की अगली कड़ी में पहुचते हैं

फोटोवोलटिक सौर ऊर्जा

फोटो वोलटिक प्रभाव की खोज वैज्ञानिकों द्वारा सन 1800 में कर ली गई थी और औद्योगिक क्रांति के दौर के कुछ कारखाने सौर शक्ति का प्रयोग भाप के उत्पादन में करते थे ।लेकिन आज बेहद बड़े पैमाने पर व्यावसायिक सौर ऊर्जा संयंत्र मौजूद हैं

पवन ऊर्जा

ऊर्जा पैदा करने वाली इस तकनीक का प्रचीन इतिहास है ।संसार में पहली पवन चक्की का उल्लेख सर्व प्रथम 200 ईसा पूर्व मिलता है ।आधुनिक पवन ऊर्जा के आन्दोलन को गति 1970 के दशक में ऊर्जा संकट के बाद मिली

सोशल नेटवर्किंग

सोशल नेटवर्किंग बेवसाइट अपनी दो विशिष्टताओं के कारण जानी जाती है इनमें प्रोफाइल और मित्र सूची कम आकर्षक नही है
सन् 1997 में लांच हुई सिक्स डिग्री डाट काम सबसे शुरूआती सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट थी।माई स्पेस का उदय इसके बाद ही हुआ था ।

ग्राफिक यूजर इंटरफेसGUI

जी यू आई के पिता कहलाने वाले डगलस इंगलबारट ने 1968 में इसकी खोज की थी इसमें एक सीआईटी डिस्प्ले ,दो की बोर्ड और पहला माउस था ।इअंगलबारट के काम से प्रेरित होकर बाद में कई लोगों ने जीयूआई के डिजाइन को परिष्कृत करने में अहम भूमिका निभाई ।।

डिजिटल फोटोग्राफी /वीडियोग्राफी

तस्वीरों का शुरुआती डिजिटल स्वरूप ही वीडियो के अस्तित्व का कारण बना था ।1970 में पहला सालिड स्टेट वीडियो कैमरे का प्रोटोटाइप तैयार हुआ लेकिन 1981 में सोनी द्वारा तैयार किया गया मैविका स्टिल कैमरा वास्तव में एक वीडियो कैमरे की तरह था ।1980 के दशक के आखिर में मेगा पिक्सल सेंसर के विकास और वीडियो के भंडारण में सुधार के साथ डिजिटल फोटोग्राफी और वीडियो ग्राफी को व्यावसायिक रूप में आसान बनाया ।

रेडियो फ्रीक्वेंसी आई डेटिंटी फिकेशन

दूसरे विश्व युद्ध के समय इस तकनीक का उपयोग विमान पहचान में किया जाता था ।1970 के दशक में RFID का पहला पेटेंट कराया गया ।स्वचालित पथकर भुगतान प्रणाली में इस तकनीक के प्रयोग किए जाने के बाद 1980 के दशक में इसका व्यावसायिक रूप सामने आया था ।आज दुनियाभर के तमाम खुदरा विक्रेता इसका प्रयोग सूची बनाने में कर रहे हैं ।

जेनेटिकली माडीफाइड जीएम प्लांट्स

सन 1980 के दशक में ग्रेग जान मेडल के प्रयोग मे प्राकृतिक विकास स्वरूप जी एम पौधों का विकास हुआ ।1994 में पहले जीएम पौधे के रूप में कैलीफोरनिया मे टमाटर की एक प्रजाति विकसित कर बाजार में उतारी गई थी ।ज्यादा उत्पादन,रोग प्रतिरोधक क्षमता के चलते आज इन फसलों का बोलबाला है ।।

जैव ईंधन

इनका शुरुआती इतिहास रूडोलफ डीजल के जमाने से है जिन्होने अपना पहला इंजन मूंग फली के तेल से चलाया था ।1908 में हेनरी फोर्ड ने माडल टी नामक इंजन बनाया जो एथनॉल से से चलता था ।हालाकि जल्दी ही इन आविष्कारको को यह लग गया था कि पेट्रोल ईंधन का सबसे सशक्त माध्यम बन रहा है ।।।लेकिन आज फिर से पर्यावरण के मुद्दे के कारण जैव ईंधन का उद्योग तेजी से बढ रहा है ।।।

एटीएम

आटोमेटेड टेलर मशीन का शुरुआती संस्करण 1960 के दशक में आया था ।लेकिन तब इनसे रकम निकालने को लेकर बाध्यताओं का बोलबाला था ।लेकिन 1970 के दशक में चुम्बकीय पट्टी वाले कार्ड्स का विकास हुआ तधा कम्प्यूटर से जुड़ने के बाद इसके प्रयोग को गति मिली थी ।
आशा है इन बेमिसाल आविष्कारों के बारे में जानकर आपको खुशी मिलेगी ।आपका
धन्यवाद।।।।।।
।।।।लेखक के पी सिंह
13022018

दुनिया को स्मार्ट बनाने वाले खास आविष्कार भाग-2

दोस्तों इस लेख के पूर्व मैने आपको दुनिया को स्मार्ट बनाने वाले खास आविष्कारों के बारे में बताया था ।उसी क्रम को बढाते हुए कुछ और ऐसे ही आविष्कारों की चर्चा करने के लिए प्रस्तुत है उसी लेख की आगे की कड़ी अर्थात
दुनिया को बदल देने वाले खास आविष्कारों की प्रस्तुति का भाग दो–

ओपेन सोर्स साफ्टवेयर

इसका मतलब यह है कि बिना किसी प्रतिबंध के आपरेटिंग सिस्टम तैयार करना ।रिचर्ड स्टाल मैन ने इस प्रोजेक्ट की शुरूआत 1984 में की थी ।पहले मुफ्त साफ्टवेयर लाइसेंस का प्रकाशन भी इन्होने ही किया था ।फलस्वरूप इसके आगे लिनक्स, मोजिला विकीपीडिया आदि जारी किए गए थे ।

ल ई डी
लाइट इमीटिंग डायोडस

शीतल प्रकाश उत्सर्जित करने वाले इन छोटे स्रोतों के साथ यद्यपि 1900 के शुरूआती वर्षों से ही प्रयोग हो रहा था लेकिन यह तकनीक 1960 से पहले अव्यवहारिक ही थी ।याद रखें कैलकुलेटर पहला उत्पाद है जिसमें एल ई डी का प्रयोग किया गया ।1970/80 के दशक में तमाम उपकरणों तथा वाहनों में इसे लगाया गया ।

एल सी डी
लिक्विड क्रिस्टल डिस्प्ले

यह तकनीक सन 1980 के उत्तरार्ध में पहली बार मानव खोज अभियान में शामिल की गई थी ।लेकिन यह भी सच है कि 1960 से पहले वैज्ञानिकों को बिजली के उपयोग द्वारा क्रिस्टल के साथ जटिल स्वरूप तैयार करने की जानकारी नही थी ।1970 के दशक में पहली एलसीडी तैयार की गई थी ।और उसके बाद यह इस कदर प्रसिद्ध हुई कि आज इसका प्रयोग घड़ी, टीवी, कम्प्यूटर वाहनों के साथ-साथ अन्य उत्पादों में भी किया जाने लगा है ।

दुनिया को स्मार्ट बनाने वाले खास आविष्कार भाग-2

कई उपग्रहों के नेटवर्क द्वारा धरती पर किसी स्थान विशेष को सटीक रूप से चिन्हित करना इस तकनीक का कमाल है।1993 में अमेरिकी रक्षा विभाग द्वारा 24 उपग्रहों के जीपीएस को आनलाइन लाया गया था।यद्यपि इसकी कल्पना सैन्य विभाग के लिए की गई थी लेकिन आज गैर सैन्य कार्यों में इसकी बहुतायत में जरूरत महसूस की जाती है ।आज इसी कारण यह क्षेत्र एक उद्योग की सकल ले चुका है।।कार घड़ी,मोबाइल, फोन हर जगह इस डिवाइस का प्रयोग देखा जा सकता है ।

ई कॉमर्स
आनलाइन शापिंग

आज इलेक्ट्रॉनिक कामर्स इलेक्ट्रॉनिक डाटा इंटर चेंज के बाहर विकास कर रहा है।1960 /70 के दशक में कंपनियां लेन-देन कम्प्यूटर माध्यम से करती थीं ।1980 के दशक में कम्प्यूसर्व ने अपने उपयोग कर्ताओं के लिए एक इलेक्ट्रॉनिक माल तैयार किया लेकिन यह उपयोग कर्ताओं के अनुकूल नही था ।वहीं 1990 के दशक में ज्यों ही वर्ल्ड वाइड वेब और ब्राउज़र की खोज की गई तो ई कामर्स को आसमान छूने में समय नही लगा ।

मीडिया फाइल कम्प्रेशन

1970 के दशक में कम्प्यूटर वैज्ञानिकों द्वारा टेक्स्ट फाइलों को स्टोर करने के लिए इस तकनीक का विकास किया गया था ।सन् 1980 में कमेटी आफ एक्सपर्ट ने लोकप्रिय कम्प्रेशन स्टैंडर्ड तैयार किया जिसे आज हम जेपीईजी और एमपीईजी के नाम से जानते हैं

माइक्रोफाइनेंस

गरीबों या फिर कम आय वालों तक वित्तीय सेवाएं सुलभ कराने वाली यह अवधारणा सदियों से चली आ रही है ।लेकिन 1980 के दशक में इसने एक विस्तृत रूप ले लिया ।बांग्लादेश के अर्थशास्त्री मुहम्मद यूनुस ने ग्रामीण बैंक की स्थापना करके इसी के चलते ग्रामीणों में उम्मीदों की किरण ही जगमगा दी है ।

लेखक के पी सिंह
Kpsingh9775@gmail.com
13022018

Who is the creator of our destiny? हमारे भाग्य का निर्माता कौन है?

यह एक ऐसा स्वाभाविक सवाल है जो किसी न किसी रूप में समाज में सभी लोगो के मन में पाया जाता है ।फिर चाहे वह कोई पढा लिखा प्रफेशनल व्यक्ति हो या फिर कोई दीन दुनिया से बेखबर कोई आम साधारण इन्सान ही क्यों न हो ।हम सभी को यह जानने की उत्सुकता बराबर रहती है कि आखिर मनुष्य के भाग्य का फैसला कौन करता है?

भाग्य का निर्माता बनाम ईश्वर (Creator of destiny versus God)

कुछ लोगों का विचार है कि ईश्वर हमारे भाग्य को पहले से ही लिख देता है अर्थात हमें क्या बनना है या क्या नहीं बनना है यह बहुत कुछ भाग्य के निर्माता उस ईश्वर के हांथ मे है जो हमारे साथ साथ पूरी दुनिया के भाग्य का लेखा-जोखा रखता है ।और हम सब के भाग्य के अनुसार ही हमें जीवन में सफलता और असफलता से रूबरू कराता है ।इस लिए हमें जो भी अच्छा बुरा जीवन प्राप्त हो उसे स्वीकार कर लेना चाहिए ।ईश्वर या फिर अपने भाग्य से बिना किसी शिकायत या शर्त के ।यही हमारा परम कर्तव्य भी है ।

भाग्य का निर्माता बनाम हमारे कर्म (Manufacturer of Destiny vs Our Work)

ईश्वर यद्यपि संसार का मालिक है लेकिन इसके बावजूद कुछ लोगों का मानना है कि यह सच नही है कि ईश्वर हमारे भाग्य का निर्माता है या फिर ईश्वर हमारे भाग्य को पहले से ही तय कर देता है ।इस लिए हमें उसकी इच्छा मानकर अपने भाग्य को स्वीकारते हुए ज्यादा उछल कूद करने की नही सोचना चाहिए ।जो लोग इस विचार धारा को मानते हैं उनका कहना है कि वास्तव में हमारे भाग्य का कोई भी अन्य निर्माता नही होता बल्कि हम स्वयं अपने-अपने भाग्य के मालिक होते हैं ।अर्थात ईश्वर द्वारा नही बल्कि हमारे आचरण और कर्मों के अनुसार हमारे भाग्य का निर्धारण हम स्वयं करते हैं न कि कोई दूसरी अलौकिक शक्ति । (

कर्म वीर और हमारे भाग्य का रहस्य (Karm Veer and the secret of our fate)

इस संसार मे जो भी व्यक्ति अपने कर्तव्य को महत्व देते हैं उनका कहना है कि जो कुछ भी हम मनुष्य का जीवन प्राप्त करने के बाद अच्छा बुरा पाप पुण्य हासिल करते हैं उस सब के लिए हमारा खुद का जीवन ही वास्तव में मालिक होता है न कि ईश्वर ।लेकिन जो लोग ईश्वर को बीच में शामिल करते हैं तो उनका उद्देश्य अपनी ड्यूटी या अपने कर्मों के फल से भागने का होता है ।

हमारे भाग्य का निर्माता और पैंतरेबाजी (Our Destiny Manufacturer and Maneuver)

चूंकि हर मनुष्य को अपने कर्मों पर नही बल्कि
अपने भविष्य के सुखद और अच्छे होने पर ज्यादा ध्यान रहता है इसलिए दुनिया में भाग्य की पैंतरेबाजी का विकास हुआ और यह क्रम सैकड़ों सालों से अबाध चल रहा है ।किसी जमाने में तो राजा-महाराजा बाकायदा राज ज्योतिष रखने के प्रति बेहद संवेदनशील थे और मजेदार बात यह है कि आज भले इसका रूप बदल गया हो लेकिन असलियत जरा भी नही बदली ।आज भी बड़े बड़े राजनेता अभिनेता इसी लकीर के फकीर बनकर भाग्य को जानने के लिए हर क्षण लालायित दिखाई देते हैं ।

भाग्य का फैसला बनाम हमारा भविष्य (Fortune Decision vs Our Future)

यह सच है कि भाग्य हर व्यक्ति के हांथ मे होता है लेकिन हम चूंकि अपनी जिम्मेदारी के एहसास से दूर होते हैं इसलिए भाग्य की कहानी हमें ज्यादा आकर्षित करती है ।
सच कहें तो हम इसी लिए भाग्य जानने के प्रति हर वक्त संजीदा रहते हैं ।लेकिन जिन्हे अपने कर्म और अपने पुरुषार्थ पर भरोसा होता है तो वह भाग्य पर नही अपने खुद के भरोसे पर ज्यादा ध्यान देते हैं ।

लेखक :केपी सिंह
Kpsingh9775@gmail.com
13022018

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क्या सचमुच हम एक स्मार्ट दुनिया में जी रहे हैं?

अगर आप के पास इस सवाल का जवाब हां है यानी आप यह मानते हैं कि हम आप आज जिस आधुनिक दुनिया में जी रहे हैं वह स्मार्ट दुनिया हैं तो हम आपको यह भी इस लेख में बताने की कोशिश करेंगे कि हम जिस आधुनिक दुनिया में जी रहे हैं तो उसे स्मार्ट बनाने में कौन-कौन से प्रमुख विज्ञान के आविष्कारों का हांथ है ।
लेकिन इससे पहले कि हम आप को विज्ञान के इन दुनिया बदलने वाले आविष्कारों की लिस्ट में ले जाएं जरा याद कीजिए कि आप ने हांथ से किसी मित्र या रिश्तेदार को अंतिम बार चिट्ठी कब लिखी थी?
मुझे नहीं लगता कि आप इस सवाल का जवाब दे पाएंगे क्योंकि आज हम मेल या ईमेल के जमाने में हांथ से लिखे पत्र की कल्पना भी नही कर सकते ।
यह बिल्कुल सच है दोस्तों कि हमारी दुनिया पिछले तीस चालीस सालों में बदल चुकी है और इसके पीछे जिन अहम आविष्कारों की सबसे खास भूमिका है उनका वर्णन इस प्रकार है-

Wwwया वर्ल्ड वाइड वेब

इसे नेटवर्क का नेटवर्क कहा जाता है ।कम्प्यूटर कनेक्शन के इन्फ्रास्ट्रक्चर से हम वर्ल्ड वाइड वेब के प्रयोग द्वारा ईमेल भेजने या फाइल शेयर करने के साथ-साथ सर्च इंजन में कुछ संकेत अक्षर लिख कर किसी विषय विशेष से संबंधित जानकारी ढूंढने में सक्षम हैं ।इन्टरनेट की आधारशिला यद्यपि 1979 से पहले ही रखी जा चुकी थी लेकिन दुनिया के दैनिक कामकाज के ढंग को बदलकर रख देने वाले इस इस नायाब तरकीब का प्रयोग 1990 के बाद तब प्रारंभ हुआ जब www की खोज टिम बर्न ने की थी ।

पीसी अथवा लैपटॉप कम्प्यूटर

सन् 1981 में आईबीएम ने आईबीएम 5150 माडल के लांच द्वारा पीसी नाम को चर्चित किया था ।1981 में ही आसबर्न1 नामक पहला लैपटॉप बाजार में उतारा था ।हालाकि इसका वजन दस किलोग्राम से भी ज्यादा था बावजूद इसके पिछले दो दशकों में कम्प्यूटर और लैपटॉप लगातार छोटे हल्के और पोर्टेबल होते गए हैं और साथ साथ इनकी ताकत भी बढती गई है ।फलस्वरूप दुनियाभर में इनकी हर वक्त मांग बढती ही जा रही है ।

मोबाइल फोन

क्या आपको पता है कि पहला मोबाइल फोन 1982 में बाजार में आया था ।इसे बनाने वाली कंपनी नोकिया थी ।आप को हैरानी होगी कि आज जिस मोबाइल के वजन की कल्पना हम पचास ग्राम से ज्यादा नही कर सकते उस मोबाइल का तब वजन दस किलोग्राम से अधिक था ।आज मोबाइल ने केवल अपने दम पर किस तरह दुनियाभर को बदल दिया है इस बात से शायद ही कोई अनजान हो ।

ई-मेल

भले ही इलेक्ट्रॉनिक मेल द्वारा संदेशों को सन 1960 के दशक में मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के प्रोग्रामरो द्वारा टाइम शेयरिंग कम्प्यूटर प्रणाली द्वारा भेजा गया था लेकिन वास्तव में आम आदमी द्वारा पहली बार ईमेल का प्रयोग 1980 के दशक के अंतिम सालों में भी नही हुआ था ।इसका पहला प्रयोग पब्लिक द्वारा 1990 के बाद ही प्रारंभ हो सका था ।इस बात से इन्कार नही किया जा सकता कि निसंदेह ईमेल ने दुनिया को बदलकर रख दिया है ।

डीएनए टेस्ट और मानव जीनोम मैपिंग

यह सच है कि सन 1953 में वाटसन तथा क्रिक ने डीएनए की खोज कर ली थी लेकिन बावजूद इसके 1970 के बाद ही वैज्ञानिक डीएनए अणुओं का अनुक्रमण करने में सफलता प्राप्त की थी ।लेकिन सच कहें तो इस दिशा में असली क्रांति तब आई थी जब 1990 में अमेरिकन सरकार ने मानव जीनोम की मैपिंग के प्रयास करना प्रारंभ किया ।और यह प्रयास पहली बार 2003 में सफल हुआ था ।इसने हम सब के जीवन में क्या भारी परिवर्तन कर दिया है हर कोई जानता है ।

MRI मैग्नेटिक रीजोनेशं इमेजिंग

1970 के दशक में वैज्ञानिकों ने न्यूक्लियर मैग्नेटिक रीजोनेशं के प्रयोग द्वारा तस्वीर तैयार करने की विधि का पता लगाया था ।वास्तव में वैज्ञानिकों ने इन तस्वीरों का प्रयोग ऊतक नमूनों के आधार पर बीमारियों का पता लगाने के लिए किया था ।सन 1977 में एक प्रोटोटाइप एमआरआई मशीन द्वारा पहली बार पूरे मानव शरीर को स्कैन किया गया था लेकिन यह दुर्लभ तकनीक आम आदमी तक 1990 के आखिरी दशक में ही पहुंच पाई थी ।

माइक्रोप्रोसेसर

एक माइक्रोप्रोसेसर अपने आप में अकेला एकीकृत परिपथ होता है ।जिसकी अपनी एक सेंट्रल प्रोसेसिंग यूनिट होती है ।सन 1970 के दशक में कैलकुलेटर में प्रयोग के तौर पर पहली बार इसका विकास किया गया था ।1970 के दशक के अंतिम सालों में इस तकनीक ने माइक्रो कम्प्यूटर के विकास का मार्गदर्शनकिया था ।

फाइबरआपटिकस

आपको यह जानकर हैरानी हो सकती है कि इस तकनीक के पीछे मौजूद विज्ञान का अध्ययन सन 1800 से किया जा रहा है ।लेकिन संचार माध्यमों के उपयोग लायक इसकी गुणवत्ता में व्यापक सुधार 1970 के बाद हुआ था ।अपनी खूबियों के चलते केबल के रूप में फाइबर आपटिक जल्दी ही श्रेष्ठ माध्यम बन गया ।इससे 100 गीगाबाइटस प्रति सेकंड से ज्यादा तेज गति से संकेत भेजे जा सकते हैं ।

आफिस साफ्टवेयर

वर्ल्ड प्रोसेसिंग और स्प्रेडशीट से हमारे कारोबार करने का तरीका बदल गया है ।1960/70 के दशक में विकसित किए गए इस साफ्टवेयर से हमारी कार्य शक्ति की विश्लेषण क्षमता और दक्षता में गुणात्मक सुधार आया है ।1979 में विजीकैलक नामक पहला स्प्रेडशीट प्रोग्राम बाजार मे आया था ।1979 में ही लांच वर्ड स्टार प्रोग्राम 1980 के दशक में सबसे लोकप्रिय वर्ल्ड प्रोसेसिंग प्रोग्राम रहा था ।

नान इनवेसिव लेजर रोबोटिक सर्जरी

हमारी दुनिया का 1980 का दशक शल्य चिकित्सा के क्षेत्र के लिए विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा है ।1987 में पहली बार नान इनवैसिव या लैपरोसकोपिक सर्जरी की शुरुआत हुई थी ।1985 में पहली बार बायोप्सी मे रोबोट का उपयोग किया गया था ।80 के दशक की शुरुआत में वैज्ञानिक समूह ने यह सत्य खोज निकाला कि कार्बनिक ऊतकों को काटने में लेजर का प्रयोग किया जा सकता है सच कहें तो इन सभी खोजों ने रोगियों के लिए सल्यचिकितसा को और भी कारगर और सुरक्षित बनाने में महती भूमिका निभाई है ।

लेखक के पी सिंह
Kpsingh 9775@gmail.com
12022018

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हम सचमुच किसके गुलाम हैं? ??

Lifehacks :     आप कहेंगे हम तो सन् 1947 में गुलामी से आजाद हो गए थे फिर यह गुलामी और आजादी वाली बात क्यों की जा रही है,  तो दोस्तों मैं आपसे जो कहना चाहता हूं वह उस गुलामी की बात नही है, बल्कि मैं उस गुलामी की बात करना चाहता हूं जिस गुलामी में न केवल भारत वासी शामिल हैं बल्कि अंग्रेजों के साथ साथ पूरी की पूरी तथाकथित विकसित दुनिया ही शामिल है ।

क्या हम गुलाम हो चुके हैं? इस सवाल का जवाब भी देने के पहले आपको लगेगा कि यह भी एक फालतू सवाल है लेकिन दोस्तों इस बार भी मैं आपसे यही कहूंगा कि यह भी झूठ नही बल्कि सोलह आना सच है कि हम और हमारी आने वाली पीढ़ी की गुलामी पूरी तरह से सिद्ध हो चुकी है इसलिए यह पूरी तरह से सच है कि हम गुलाम हो चुके हैं । हम सब सच में इसके हैं गुलाम जी हां दोस्तों हम भारतीय लोग अंग्रेजों के साथ ही पूरी दुनिया की तरह जिसके गुलाम हैं वह कोई देश या कोई दैत्य दानव नहीं बल्कि वह गुलामी है विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की गुलामी ।आप कहेंगे विज्ञान तो हमारे विकास का प्रमाण है इसमें गुलामी कहां से आई तो भाइयो बहनों जरा गौर फरमाने की कृपा करें और कहीं दूर मत जाइए केवल खुद पर एक सर्च निगाह डालिए ।आप हैरान रह जाएंगे कि सुबह से शाम और शाम से सुबह तक हमारा पल पल विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के साथ नही बीतता बल्कि यह बीतना गुलामी की तरह है जो हमें सोते जगते, उठते-बैठते हर वक्त कभी विज्ञान की छाया से दूर ही जाने नही देता ।

बढती विडम्बना और विज्ञान जी हां दोस्तों प्रेम चंद्र की कहानी मंत्र की तरह यद्यपि हम चिकित्सा सुविधा से एक तरफ वंचित नही रहते तो दूसरी तरफ यह विडम्बना नही तो और क्या है कि हम इसी विज्ञान की वजह से ही चिकित्सा की शरण में जाते हैं । क्या आपने महसूस नही किया कि हम जिस गति से अपने आप को विज्ञान का जीता-जागता दास बनाने की की सफल कोशिश कर रहे हैं वह हमारे विनाश का कारण है ।आज का आदमी इसके बावजूद यह सोच तक नही पाता कि विज्ञान हमारे लिए वह शासक बन चुका है जिसके राज्य में कभी सूरज नहीं डूबता ।। सुबह-शाम बस यही कहानी जी हां दोस्तों हम छोटे छोटे उन दैनिक कार्यों के लिए विज्ञान के मोहताज बन चुके हैं जिन्हें हमें अपने शरीर की सुरक्षा के लिए करना चाहिए लेकिन वाह रे इन्सान रोटी बनाने की मशीन, गाय से दूध दुहने की मशीन और तो और अब हम यह भी कर रहे हैं कि यदि हम अपने खाने में विटामिन शामिल नही कर पाते तो विटामिन की गोली ही बना डाली ।यानी आप को विटामिन के लिए नीबू संतरा के पास तक नही जाना पड़ेगा और आपके शरीर को संतरे नीबू से मिलने वाले तत्व गोली खाने से मिल जाएंगे हमें सच में गोली से दुख नही है हमें दुख है तो सिर्फ इससे कि हम विटामिन भी शरीर को उधार ले कर दे रहे हैं ।

निष्कर्ष और हकीकत जिन लोगों को अब भी मेरी बात समझ में न आई हो तो मैं एक बार फिर दोहराना चाहता हूं कि हम जिस गति से अपने छोटे छोटे कामों के लिए हर क्षण विज्ञान के भरोसे रहने के आदी हो गए हैं यह हमारे लिए सामान्य स्थिति न होकर विचारणीय और बेहद गंभीर स्थिति है । तो क्या करें जनाब???? अगर आप भी झुंझलाहट में मुझसे यही सवाल करना चाहते हैं और मुझे विज्ञान का दुश्मन समझते हैं तो सबसे पहले तो यह दोनों विचार त्याग दीजिए फिर सच्चाई और बिना पूर्वाग्रह के सोचिए कि यदि हम अपने दैनिक छोटे छोटे कार्य खुद करेंगे तो मेहनत जरूर लगेगी लेकिन यह भी सोचिए कि तब आपका घर बीमारी से पीड़ित घर नही कहलाएगा बल्कि सुखी सम्पन्न घर कहलाएगा ।।मुझे विज्ञान चाहिए लेकिन इस हद तक नही कि मुझे इसकी सुविधा ही परेशान करने वाली हो ।

धन्यवाद!

लेखक : केपी सिंह

Kpsingh9775@gmail.com

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