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ब्लैक बॉक्स का आविष्कार किसने किया था?

महान उपलब्धि है ब्लैक बॉक्स

दोस्तों या तो आपने खुद विचार किया होगा या फिर किसी ने आप से पूछा होगा कि जब भी दुनिया के किसी कोने में विमान हादसा हो जाता है तो सबसे पहले यही प्रयास क्यों किया जाता है कि ब्लैक बॉक्स को सबसे पहले सुरक्षित रखने की बात क्यों की जाती है ?
लेकिन यदि इस विषय मे आपने किसी से या आप से किसी ने नही भी पूछा तो भी आपके मन में यह जिज्ञासा जरूर होगी कि आखिर ब्लैक बॉक्स की हकीकत क्या है
दोस्तों आप निश्चित रहें आप को आज यह जानकारी मैं अपनी अगली पंक्तियों मे ही देने वाला हूं कुछ इस तरह,,,,

ब्लैक बॉक्स और डेविड वारेन

जी हां दोस्तों आज जिस ब्लैक बॉक्स की हम यहां चर्चा कर रहे हैं उसका आविष्कार आस्ट्रेलिया के महान साइंटिस्ट डेविड वारेन ने सन 1950 के दशक में किया था ।वारेन मेलबोर्न के एरोनाटिकल रिसर्च लेबोरेट्रीज में काम करते थे ।संयोग से उसी समय पहला जेट आधारित कामर्शियल एयरक्राफ्ट “कामैट” दुर्घटना ग्रस्त हो गया था ।वारेन दुर्घटना की जांच करने वाली टीम में शामिल थे ।
तभी उनके मन में एक ख्याल आया कि क्यों न कोई ऐसा यंत्र हो जो विमान हादसे के बाद काफी समय तक दुर्घटना के कारणों को सहेज कर रखे ।।
सच कहें तो ब्लैक बॉक्स अर्थात फ्लाइट डाटा रिकॉर्डर के निर्माण का कार्य तभी प्रारंभ हुआ था ।इसके बाद वह दिन भी आया जब आस्ट्रेलिया को विश्व में प्रथम बार कामर्शियल एयरक्राफ्ट में ब्लैक बॉक्स या फिर फ्लाइट डाटा रिकॉर्डर लगाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ ।
और इस तरह दुनिया में ब्लैक बॉक्स का जन्म हो गया

ब्लैक बॉक्स वास्तव में क्या है?

किसी विमान हादसे की वजह का पता लगाने में दो डिवाइस बेहद महत्वपूर्ण होते हैं ।एक है एफडीआर यानी फ्लाइट डाटा रिकार्डर और दूसरा है सीवीआर यानी कॉकपिट वाइस रिकार्डर ।इसे ही ब्लैक बॉक्स कहा जाता है ।एक में कॉकपिट के अंदर की बातचीत रिकॉर्ड होती है तो दूसरी डिवाइस या सीवीआर में विमान से जुड़े आंकड़े जुटाए जाते हैं ।
ब्लैक बॉक्स का एक रोचक तथ्य यह है कि इसका रंग काला नही होता बल्कि इसका रंग नारंगी होता है ।ब्लैक बॉक्स में पानी और आग का कोई असर नहीं होता ।और तो और 20 हजार फुट दूर से इसका पता लगाया जा सकता है ।यद्यपि ब्लैक बाक्स की बैट्री केवल तीस दिन तक चलती है लेकिन इसके डाटा को सालों-साल रखा जा सकता है।

ब्लैक बॉक्स कुछ खास

ब्लैक बॉक्स को विमान मे पिछले हिस्से में लगाया जाता है ।क्यों कि यह दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना की स्थिति में यहां सबसे ज्यादा सुरक्षित होता है ।ब्लैक बॉक्स को कई महत्वपूर्ण टेस्ट से गुजरना पड़ता है ।उदाहरण के तौर पर ब्लैक बॉक्स रिकार्डर L3FA2100 ग्यारह सौ डिग्री सेल्सियस फायर में कई घंटे और 260 डिग्री सेल्सियस हीट में 10 घंटे तक रह सकता है ।
इतना ही नहीं यह माइनस 55से 70 डिग्री सेल्सियस तापमान पर भी बिना किसी रुकावट के काम करता है ।1960 में आस्ट्रेलिया पहला ऐसा देश था जहां विमानों में ब्लैक बॉक्स लगाना सख्त अनिवार्य था ।जहां तक बात भारत की है तो यहां नागर विमानन महानिदेशालय के नियमों के अनुसार 1जनवरी 2005 से सभी विमानों और हेलीकॉप्टरों में FDR तथा CVC का लगाया जाना अनिवार्य किया गया था ।

दुर्घटना के बाद
ब्लैक बॉक्स की प्राप्ति

हादसे के बाद जब विमान का ब्लैक बॉक्स मिल जाता है तो विशेषज्ञ उसे सीधा लैब ले जाते हैं।इसके बाद हादसे के कारणों की सूक्ष्म जांच की जाती है ।जिन यंत्रों इसमे महत्वपूर्ण भूमिका होती है उनमें प्रमुख हैं टावेड पिंगर लोकेटर25और ब्ल्यूफिन21 ।लोकेटर25 सिग्नल को 6000 मीटर तक की गहराई से ढूंढ लेता है तो वहीं ब्ल्यूफिन21 4500 मीटर की गहराई से ब्लैक बॉक्स को ढूंढ कर लाता है ।ध्यान रहे ब्ल्यूफिन21 को अंडर वाटर ड्रोन भी कहा जाता है ।

ब्लैक बॉक्स कुछ खास

ब्लैक बॉक्स में दुर्घटना से 25 घंटे पहले तक का रिकॉर्ड होता है
ब्लैक बॉक्स में अंडर वाटर लोकेटिअंग डिवाइस होती है जो 14000 फीट नीचे से सिग्नल भेज सकती है
ब्लैक बॉक्स को धातु के चार लेयर या परत में रखा जाता है
ब्लैक बाक्स की चार लेयर इस प्रकार होती हैं
एल्युमीनियम,सूखा बालू,स्टेनलेस स्टील और सबसे बाद मे टाइटेनियम ।
ब्लैक बॉक्स कॉकपिट के अंदर होने वाली सभी बातचीत,रेडियो कम्युनिकेशन, उड़ान का विवरण जैसे स्पीड, इंजन की स्थिति, हवा की गति, विमान की उंचाई, रडार की स्थिति आदि को रिकॉर्ड करता है ।

धन्यवाद
लेखक :के पी सिंह
13022018

दुनिया को स्मार्ट बनाने वाले खास आविष्कार भाग -3

दोस्तों अब हम अपने लेख “दुनिया को स्मार्ट बनाने वाले खास आविष्कार” की तीसरी कड़ी में आ गए हैं।इसलिए यहां पर हम कुछ और चर्चा न करके सीधे अपने लेख की अगली कड़ी में पहुचते हैं

फोटोवोलटिक सौर ऊर्जा

फोटो वोलटिक प्रभाव की खोज वैज्ञानिकों द्वारा सन 1800 में कर ली गई थी और औद्योगिक क्रांति के दौर के कुछ कारखाने सौर शक्ति का प्रयोग भाप के उत्पादन में करते थे ।लेकिन आज बेहद बड़े पैमाने पर व्यावसायिक सौर ऊर्जा संयंत्र मौजूद हैं

पवन ऊर्जा

ऊर्जा पैदा करने वाली इस तकनीक का प्रचीन इतिहास है ।संसार में पहली पवन चक्की का उल्लेख सर्व प्रथम 200 ईसा पूर्व मिलता है ।आधुनिक पवन ऊर्जा के आन्दोलन को गति 1970 के दशक में ऊर्जा संकट के बाद मिली

सोशल नेटवर्किंग

सोशल नेटवर्किंग बेवसाइट अपनी दो विशिष्टताओं के कारण जानी जाती है इनमें प्रोफाइल और मित्र सूची कम आकर्षक नही है
सन् 1997 में लांच हुई सिक्स डिग्री डाट काम सबसे शुरूआती सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट थी।माई स्पेस का उदय इसके बाद ही हुआ था ।

ग्राफिक यूजर इंटरफेसGUI

जी यू आई के पिता कहलाने वाले डगलस इंगलबारट ने 1968 में इसकी खोज की थी इसमें एक सीआईटी डिस्प्ले ,दो की बोर्ड और पहला माउस था ।इअंगलबारट के काम से प्रेरित होकर बाद में कई लोगों ने जीयूआई के डिजाइन को परिष्कृत करने में अहम भूमिका निभाई ।।

डिजिटल फोटोग्राफी /वीडियोग्राफी

तस्वीरों का शुरुआती डिजिटल स्वरूप ही वीडियो के अस्तित्व का कारण बना था ।1970 में पहला सालिड स्टेट वीडियो कैमरे का प्रोटोटाइप तैयार हुआ लेकिन 1981 में सोनी द्वारा तैयार किया गया मैविका स्टिल कैमरा वास्तव में एक वीडियो कैमरे की तरह था ।1980 के दशक के आखिर में मेगा पिक्सल सेंसर के विकास और वीडियो के भंडारण में सुधार के साथ डिजिटल फोटोग्राफी और वीडियो ग्राफी को व्यावसायिक रूप में आसान बनाया ।

रेडियो फ्रीक्वेंसी आई डेटिंटी फिकेशन

दूसरे विश्व युद्ध के समय इस तकनीक का उपयोग विमान पहचान में किया जाता था ।1970 के दशक में RFID का पहला पेटेंट कराया गया ।स्वचालित पथकर भुगतान प्रणाली में इस तकनीक के प्रयोग किए जाने के बाद 1980 के दशक में इसका व्यावसायिक रूप सामने आया था ।आज दुनियाभर के तमाम खुदरा विक्रेता इसका प्रयोग सूची बनाने में कर रहे हैं ।

जेनेटिकली माडीफाइड जीएम प्लांट्स

सन 1980 के दशक में ग्रेग जान मेडल के प्रयोग मे प्राकृतिक विकास स्वरूप जी एम पौधों का विकास हुआ ।1994 में पहले जीएम पौधे के रूप में कैलीफोरनिया मे टमाटर की एक प्रजाति विकसित कर बाजार में उतारी गई थी ।ज्यादा उत्पादन,रोग प्रतिरोधक क्षमता के चलते आज इन फसलों का बोलबाला है ।।

जैव ईंधन

इनका शुरुआती इतिहास रूडोलफ डीजल के जमाने से है जिन्होने अपना पहला इंजन मूंग फली के तेल से चलाया था ।1908 में हेनरी फोर्ड ने माडल टी नामक इंजन बनाया जो एथनॉल से से चलता था ।हालाकि जल्दी ही इन आविष्कारको को यह लग गया था कि पेट्रोल ईंधन का सबसे सशक्त माध्यम बन रहा है ।।।लेकिन आज फिर से पर्यावरण के मुद्दे के कारण जैव ईंधन का उद्योग तेजी से बढ रहा है ।।।

एटीएम

आटोमेटेड टेलर मशीन का शुरुआती संस्करण 1960 के दशक में आया था ।लेकिन तब इनसे रकम निकालने को लेकर बाध्यताओं का बोलबाला था ।लेकिन 1970 के दशक में चुम्बकीय पट्टी वाले कार्ड्स का विकास हुआ तधा कम्प्यूटर से जुड़ने के बाद इसके प्रयोग को गति मिली थी ।
आशा है इन बेमिसाल आविष्कारों के बारे में जानकर आपको खुशी मिलेगी ।आपका
धन्यवाद।।।।।।
।।।।लेखक के पी सिंह
13022018

👉कब मनाये ये त्यौहार:-  महाशिवरात्रि व्रत एवं पूजा विधि 

महाशिवरात्रि का त्यौहार फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को ही मनाया जाता है, परंतु इस वर्ष चतुर्दशी 13 एवं 14 फरवरी को होने के कारण सभी लोग इस बात से असमंजस्य में पड़े हुए है। लेकिन शिवपुराण के अनुसार श्रवण नक्षत्र युक्त चतुर्दशी व्रत के लिए सर्वोत्तम मानी जाती है।महाशिवरात्रि व्रत एवं पूजा विधि

जो कि तिथि 13 फरवरी की रात से 11:34 से लग जायेगी और अगले दिन 14 फरवरी को रात 12:47 तक रहेगी। 14 फरवरी को नक्षत्र सुबह  4:56 से शुरू हो जायेगा, अतः महाशिवरात्रि 14 फरवरी को मनाना ही सर्वोत्तम है।

पूजा मुहूर्त:-

महाशिवरात्रि व्रत एवं पूजा विधि के मुहूर्त सुबह

14 फरवरी को प्रातः काल से ही सुबह 7 बजे से ही पूजा शुरू कर देनी चाहिए।

जो लोग पंडित जी से पूजा कराते है उनके लिए पूजा के खास मुहूर्त का समय।

प्रथम पूजन- सुबह 7 बजे से प्रारंभ करें।

द्वितीय पूजन- 11:15 से प्रारंभ करें।

तृतीय पूजन- दोपहर 3:30 से प्रारंभ करें।

चतुर्थ पूजन- शाम 5 :15 से प्रारंभ करे।

पंचम पूजन- रात्रि 8:00 बजे से प्रारंभ करें।

षष्ठ पूजन – रात्रि 9:30 से प्रारंभ कीजियेगा।

चार प्रहर पूजन का समय – गोधूलि बेला से प्रारंभ करके ब्रह्म मुहूर्त तक करना चाहिए।

पूजन विधि:-

महाशिवरात्रि व्रत एवं पूजा विधि

सर्वप्रथम अपने ऊपर जल छिड़के,फिर हाथ धो लें।

फिर पूजन का संकल्प करके श्री गणेशजी और माता पार्वती जी का ध्यान करें।

भगवान को रोली,चन्दन,सिंदूरचावल,फूल , चड़ाए इसके बाद हाथ मे बिल्वपत्र एवं अक्षत लेकर भगवान शिव का ध्यान करें।

भगवान शिव का ध्यान करके शिवजी को आसन प्रदान करें।

जल से स्नान कराकर दूध स्नान, दही स्नान ,घी स्नान एवं शहद स्नान करावें।फिर सुगन्धित जल से स्नान कराए।

प्रसाद चढ़ाये  अब भगवान शिव जी को जनेऊ चढ़ाये फिर वस्त्र पहनाकर उनको रोली चावल पुष्पमाला एवं मुख्य रूप से बिल्वपत्र अवश्य चढ़ाये।

महाशिवरात्रि के दिन शिवजी का स्रंगार मुख्य रूप से करें क्यों कि इस दिल शिव जी का विवाह हुआ था।

इसके बाद दीपक और धूप जलाकर शिवजी को नैवेद्य एंव विविध प्रकार के फलो का भोग लगावे। एवं ॐ नमः शिवाय मन्त्र का जाप करते रहें। इसके बाद पान सुपारी लोंग इलायची नारियल एवं दक्षिणा चढ़ाकर आरती करें।

इसप्रकार से घर में पूजा करना चाहिये जिससे भगवान शिव प्रसन्न होते है और घर के सभी लोगों को अपना आशीर्वाद प्रदान करते हैं।

तो बोलो ॐ नमः शिवाय

तो इसप्रकार महाशिवरात्रि व्रत एवं पूजा विधि से आप ये त्यौहार मनाए।

दुनिया को स्मार्ट बनाने वाले खास आविष्कार भाग-2

दोस्तों इस लेख के पूर्व मैने आपको दुनिया को स्मार्ट बनाने वाले खास आविष्कारों के बारे में बताया था ।उसी क्रम को बढाते हुए कुछ और ऐसे ही आविष्कारों की चर्चा करने के लिए प्रस्तुत है उसी लेख की आगे की कड़ी अर्थात
दुनिया को बदल देने वाले खास आविष्कारों की प्रस्तुति का भाग दो–

ओपेन सोर्स साफ्टवेयर

इसका मतलब यह है कि बिना किसी प्रतिबंध के आपरेटिंग सिस्टम तैयार करना ।रिचर्ड स्टाल मैन ने इस प्रोजेक्ट की शुरूआत 1984 में की थी ।पहले मुफ्त साफ्टवेयर लाइसेंस का प्रकाशन भी इन्होने ही किया था ।फलस्वरूप इसके आगे लिनक्स, मोजिला विकीपीडिया आदि जारी किए गए थे ।

ल ई डी
लाइट इमीटिंग डायोडस

शीतल प्रकाश उत्सर्जित करने वाले इन छोटे स्रोतों के साथ यद्यपि 1900 के शुरूआती वर्षों से ही प्रयोग हो रहा था लेकिन यह तकनीक 1960 से पहले अव्यवहारिक ही थी ।याद रखें कैलकुलेटर पहला उत्पाद है जिसमें एल ई डी का प्रयोग किया गया ।1970/80 के दशक में तमाम उपकरणों तथा वाहनों में इसे लगाया गया ।

एल सी डी
लिक्विड क्रिस्टल डिस्प्ले

यह तकनीक सन 1980 के उत्तरार्ध में पहली बार मानव खोज अभियान में शामिल की गई थी ।लेकिन यह भी सच है कि 1960 से पहले वैज्ञानिकों को बिजली के उपयोग द्वारा क्रिस्टल के साथ जटिल स्वरूप तैयार करने की जानकारी नही थी ।1970 के दशक में पहली एलसीडी तैयार की गई थी ।और उसके बाद यह इस कदर प्रसिद्ध हुई कि आज इसका प्रयोग घड़ी, टीवी, कम्प्यूटर वाहनों के साथ-साथ अन्य उत्पादों में भी किया जाने लगा है ।

दुनिया को स्मार्ट बनाने वाले खास आविष्कार भाग-2

कई उपग्रहों के नेटवर्क द्वारा धरती पर किसी स्थान विशेष को सटीक रूप से चिन्हित करना इस तकनीक का कमाल है।1993 में अमेरिकी रक्षा विभाग द्वारा 24 उपग्रहों के जीपीएस को आनलाइन लाया गया था।यद्यपि इसकी कल्पना सैन्य विभाग के लिए की गई थी लेकिन आज गैर सैन्य कार्यों में इसकी बहुतायत में जरूरत महसूस की जाती है ।आज इसी कारण यह क्षेत्र एक उद्योग की सकल ले चुका है।।कार घड़ी,मोबाइल, फोन हर जगह इस डिवाइस का प्रयोग देखा जा सकता है ।

ई कॉमर्स
आनलाइन शापिंग

आज इलेक्ट्रॉनिक कामर्स इलेक्ट्रॉनिक डाटा इंटर चेंज के बाहर विकास कर रहा है।1960 /70 के दशक में कंपनियां लेन-देन कम्प्यूटर माध्यम से करती थीं ।1980 के दशक में कम्प्यूसर्व ने अपने उपयोग कर्ताओं के लिए एक इलेक्ट्रॉनिक माल तैयार किया लेकिन यह उपयोग कर्ताओं के अनुकूल नही था ।वहीं 1990 के दशक में ज्यों ही वर्ल्ड वाइड वेब और ब्राउज़र की खोज की गई तो ई कामर्स को आसमान छूने में समय नही लगा ।

मीडिया फाइल कम्प्रेशन

1970 के दशक में कम्प्यूटर वैज्ञानिकों द्वारा टेक्स्ट फाइलों को स्टोर करने के लिए इस तकनीक का विकास किया गया था ।सन् 1980 में कमेटी आफ एक्सपर्ट ने लोकप्रिय कम्प्रेशन स्टैंडर्ड तैयार किया जिसे आज हम जेपीईजी और एमपीईजी के नाम से जानते हैं

माइक्रोफाइनेंस

गरीबों या फिर कम आय वालों तक वित्तीय सेवाएं सुलभ कराने वाली यह अवधारणा सदियों से चली आ रही है ।लेकिन 1980 के दशक में इसने एक विस्तृत रूप ले लिया ।बांग्लादेश के अर्थशास्त्री मुहम्मद यूनुस ने ग्रामीण बैंक की स्थापना करके इसी के चलते ग्रामीणों में उम्मीदों की किरण ही जगमगा दी है ।

लेखक के पी सिंह
Kpsingh9775@gmail.com
13022018

Who is the creator of our destiny? हमारे भाग्य का निर्माता कौन है?

यह एक ऐसा स्वाभाविक सवाल है जो किसी न किसी रूप में समाज में सभी लोगो के मन में पाया जाता है ।फिर चाहे वह कोई पढा लिखा प्रफेशनल व्यक्ति हो या फिर कोई दीन दुनिया से बेखबर कोई आम साधारण इन्सान ही क्यों न हो ।हम सभी को यह जानने की उत्सुकता बराबर रहती है कि आखिर मनुष्य के भाग्य का फैसला कौन करता है?

भाग्य का निर्माता बनाम ईश्वर (Creator of destiny versus God)

कुछ लोगों का विचार है कि ईश्वर हमारे भाग्य को पहले से ही लिख देता है अर्थात हमें क्या बनना है या क्या नहीं बनना है यह बहुत कुछ भाग्य के निर्माता उस ईश्वर के हांथ मे है जो हमारे साथ साथ पूरी दुनिया के भाग्य का लेखा-जोखा रखता है ।और हम सब के भाग्य के अनुसार ही हमें जीवन में सफलता और असफलता से रूबरू कराता है ।इस लिए हमें जो भी अच्छा बुरा जीवन प्राप्त हो उसे स्वीकार कर लेना चाहिए ।ईश्वर या फिर अपने भाग्य से बिना किसी शिकायत या शर्त के ।यही हमारा परम कर्तव्य भी है ।

भाग्य का निर्माता बनाम हमारे कर्म (Manufacturer of Destiny vs Our Work)

ईश्वर यद्यपि संसार का मालिक है लेकिन इसके बावजूद कुछ लोगों का मानना है कि यह सच नही है कि ईश्वर हमारे भाग्य का निर्माता है या फिर ईश्वर हमारे भाग्य को पहले से ही तय कर देता है ।इस लिए हमें उसकी इच्छा मानकर अपने भाग्य को स्वीकारते हुए ज्यादा उछल कूद करने की नही सोचना चाहिए ।जो लोग इस विचार धारा को मानते हैं उनका कहना है कि वास्तव में हमारे भाग्य का कोई भी अन्य निर्माता नही होता बल्कि हम स्वयं अपने-अपने भाग्य के मालिक होते हैं ।अर्थात ईश्वर द्वारा नही बल्कि हमारे आचरण और कर्मों के अनुसार हमारे भाग्य का निर्धारण हम स्वयं करते हैं न कि कोई दूसरी अलौकिक शक्ति । (

कर्म वीर और हमारे भाग्य का रहस्य (Karm Veer and the secret of our fate)

इस संसार मे जो भी व्यक्ति अपने कर्तव्य को महत्व देते हैं उनका कहना है कि जो कुछ भी हम मनुष्य का जीवन प्राप्त करने के बाद अच्छा बुरा पाप पुण्य हासिल करते हैं उस सब के लिए हमारा खुद का जीवन ही वास्तव में मालिक होता है न कि ईश्वर ।लेकिन जो लोग ईश्वर को बीच में शामिल करते हैं तो उनका उद्देश्य अपनी ड्यूटी या अपने कर्मों के फल से भागने का होता है ।

हमारे भाग्य का निर्माता और पैंतरेबाजी (Our Destiny Manufacturer and Maneuver)

चूंकि हर मनुष्य को अपने कर्मों पर नही बल्कि
अपने भविष्य के सुखद और अच्छे होने पर ज्यादा ध्यान रहता है इसलिए दुनिया में भाग्य की पैंतरेबाजी का विकास हुआ और यह क्रम सैकड़ों सालों से अबाध चल रहा है ।किसी जमाने में तो राजा-महाराजा बाकायदा राज ज्योतिष रखने के प्रति बेहद संवेदनशील थे और मजेदार बात यह है कि आज भले इसका रूप बदल गया हो लेकिन असलियत जरा भी नही बदली ।आज भी बड़े बड़े राजनेता अभिनेता इसी लकीर के फकीर बनकर भाग्य को जानने के लिए हर क्षण लालायित दिखाई देते हैं ।

भाग्य का फैसला बनाम हमारा भविष्य (Fortune Decision vs Our Future)

यह सच है कि भाग्य हर व्यक्ति के हांथ मे होता है लेकिन हम चूंकि अपनी जिम्मेदारी के एहसास से दूर होते हैं इसलिए भाग्य की कहानी हमें ज्यादा आकर्षित करती है ।
सच कहें तो हम इसी लिए भाग्य जानने के प्रति हर वक्त संजीदा रहते हैं ।लेकिन जिन्हे अपने कर्म और अपने पुरुषार्थ पर भरोसा होता है तो वह भाग्य पर नही अपने खुद के भरोसे पर ज्यादा ध्यान देते हैं ।

लेखक :केपी सिंह
Kpsingh9775@gmail.com
13022018

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आपको जानकर हैरानी होगी कि मोदी सरकार पर आए दिन कुछ न कुछ विवाद खड़ा होता है वजह है कि इस सरकार ने जब से अच्छा काम करना शुरू किया तब से विवादों में घिरे हुए है चलिए हम आपको बताते है क्या है वजह…..
जब महाराष्ट्र में नया आधार लिंक हुआ तब 10 लाख गरीब गायब हो गए।
उत्तराखंड से भी BPL फर्जी गरीब समाप्त हो गए।
3 करोड़ LPG फर्जी गैस कनेक्शन पर आफत आ गया।
मदरसों में 1,95,000 स्कॉलरशिप लेने वाले फर्जी गरीब बच्चे गायब हो गए।
1,00,50,000 फर्जी राशनकार्ड धारी गरीब समाप्त कर दिए गए।
जब देश के काली कमाई करने वालों गद्दारों पर काली घटा मंडराने लगे तो मिलकर सुप्रीम कोर्ट में आधार लिंक मौलिक अधिकार हनन का याचिका दायर करना ऐसे लोगों का क्या मौलिक अधिकार।
3 लाख से ज्यादा फर्जी कंपनी को बंद करवा दिया।
फर्जी राशन डीलर दुकान बंद हुआ।
संपत्ति खरीद-बिक्री करने वाले नराज होने लगे।
ऑनलाइन वर्किंग होने से बिचौलिये नाराज होने लगे।
40,000 से ऊपर फर्जी NGO बंद होने से उनके CMD नाराज होने लगे।
2 नम्बरी कमाई करने वाले व्यापारी नाराज होने लगे।
E-tender होने के कारण ठेकेदार पर आफत आने लगे।
गैस कंपनी वाले में नाराजगी स्वाभाविक है।
12 करोड़ से भी ज्यादा incomtex के दायरे में आये नाराजगी का कारण बनता है।
GST सिस्टम आने के कारण व्यापारी वर्ग को AUTOMATIC सिस्टम का प्रयोग करना पड़ रहा है।
2 नंबर और ब्लैक money को white करने वाले लोग नाराजगी जताने लगे।
आलसी, कामचोर सरकार लोकसेवकों को अब बॉयोमेट्रिक्स सिस्टम से समय पर duty जाना पड़ रहा है।
जो लोग कमीशनखोरी,रिश्वतखोरी से अपनी जिंदगी की गाड़ी खींच रहे थे तो स्वाभाविक है नाराज होना । भारत देश बदल रहा है। हमे भी देश की हर पहलू पर कंधे से कंधे मिलाकर चलने की आवश्यकता है। देश में जब हर तरफ से विकास की उलगुलान उठे तब हम साथ-साथ है। जय हिंद जय भारत

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क्या सचमुच हम एक स्मार्ट दुनिया में जी रहे हैं?

अगर आप के पास इस सवाल का जवाब हां है यानी आप यह मानते हैं कि हम आप आज जिस आधुनिक दुनिया में जी रहे हैं वह स्मार्ट दुनिया हैं तो हम आपको यह भी इस लेख में बताने की कोशिश करेंगे कि हम जिस आधुनिक दुनिया में जी रहे हैं तो उसे स्मार्ट बनाने में कौन-कौन से प्रमुख विज्ञान के आविष्कारों का हांथ है ।
लेकिन इससे पहले कि हम आप को विज्ञान के इन दुनिया बदलने वाले आविष्कारों की लिस्ट में ले जाएं जरा याद कीजिए कि आप ने हांथ से किसी मित्र या रिश्तेदार को अंतिम बार चिट्ठी कब लिखी थी?
मुझे नहीं लगता कि आप इस सवाल का जवाब दे पाएंगे क्योंकि आज हम मेल या ईमेल के जमाने में हांथ से लिखे पत्र की कल्पना भी नही कर सकते ।
यह बिल्कुल सच है दोस्तों कि हमारी दुनिया पिछले तीस चालीस सालों में बदल चुकी है और इसके पीछे जिन अहम आविष्कारों की सबसे खास भूमिका है उनका वर्णन इस प्रकार है-

Wwwया वर्ल्ड वाइड वेब

इसे नेटवर्क का नेटवर्क कहा जाता है ।कम्प्यूटर कनेक्शन के इन्फ्रास्ट्रक्चर से हम वर्ल्ड वाइड वेब के प्रयोग द्वारा ईमेल भेजने या फाइल शेयर करने के साथ-साथ सर्च इंजन में कुछ संकेत अक्षर लिख कर किसी विषय विशेष से संबंधित जानकारी ढूंढने में सक्षम हैं ।इन्टरनेट की आधारशिला यद्यपि 1979 से पहले ही रखी जा चुकी थी लेकिन दुनिया के दैनिक कामकाज के ढंग को बदलकर रख देने वाले इस इस नायाब तरकीब का प्रयोग 1990 के बाद तब प्रारंभ हुआ जब www की खोज टिम बर्न ने की थी ।

पीसी अथवा लैपटॉप कम्प्यूटर

सन् 1981 में आईबीएम ने आईबीएम 5150 माडल के लांच द्वारा पीसी नाम को चर्चित किया था ।1981 में ही आसबर्न1 नामक पहला लैपटॉप बाजार में उतारा था ।हालाकि इसका वजन दस किलोग्राम से भी ज्यादा था बावजूद इसके पिछले दो दशकों में कम्प्यूटर और लैपटॉप लगातार छोटे हल्के और पोर्टेबल होते गए हैं और साथ साथ इनकी ताकत भी बढती गई है ।फलस्वरूप दुनियाभर में इनकी हर वक्त मांग बढती ही जा रही है ।

मोबाइल फोन

क्या आपको पता है कि पहला मोबाइल फोन 1982 में बाजार में आया था ।इसे बनाने वाली कंपनी नोकिया थी ।आप को हैरानी होगी कि आज जिस मोबाइल के वजन की कल्पना हम पचास ग्राम से ज्यादा नही कर सकते उस मोबाइल का तब वजन दस किलोग्राम से अधिक था ।आज मोबाइल ने केवल अपने दम पर किस तरह दुनियाभर को बदल दिया है इस बात से शायद ही कोई अनजान हो ।

ई-मेल

भले ही इलेक्ट्रॉनिक मेल द्वारा संदेशों को सन 1960 के दशक में मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के प्रोग्रामरो द्वारा टाइम शेयरिंग कम्प्यूटर प्रणाली द्वारा भेजा गया था लेकिन वास्तव में आम आदमी द्वारा पहली बार ईमेल का प्रयोग 1980 के दशक के अंतिम सालों में भी नही हुआ था ।इसका पहला प्रयोग पब्लिक द्वारा 1990 के बाद ही प्रारंभ हो सका था ।इस बात से इन्कार नही किया जा सकता कि निसंदेह ईमेल ने दुनिया को बदलकर रख दिया है ।

डीएनए टेस्ट और मानव जीनोम मैपिंग

यह सच है कि सन 1953 में वाटसन तथा क्रिक ने डीएनए की खोज कर ली थी लेकिन बावजूद इसके 1970 के बाद ही वैज्ञानिक डीएनए अणुओं का अनुक्रमण करने में सफलता प्राप्त की थी ।लेकिन सच कहें तो इस दिशा में असली क्रांति तब आई थी जब 1990 में अमेरिकन सरकार ने मानव जीनोम की मैपिंग के प्रयास करना प्रारंभ किया ।और यह प्रयास पहली बार 2003 में सफल हुआ था ।इसने हम सब के जीवन में क्या भारी परिवर्तन कर दिया है हर कोई जानता है ।

MRI मैग्नेटिक रीजोनेशं इमेजिंग

1970 के दशक में वैज्ञानिकों ने न्यूक्लियर मैग्नेटिक रीजोनेशं के प्रयोग द्वारा तस्वीर तैयार करने की विधि का पता लगाया था ।वास्तव में वैज्ञानिकों ने इन तस्वीरों का प्रयोग ऊतक नमूनों के आधार पर बीमारियों का पता लगाने के लिए किया था ।सन 1977 में एक प्रोटोटाइप एमआरआई मशीन द्वारा पहली बार पूरे मानव शरीर को स्कैन किया गया था लेकिन यह दुर्लभ तकनीक आम आदमी तक 1990 के आखिरी दशक में ही पहुंच पाई थी ।

माइक्रोप्रोसेसर

एक माइक्रोप्रोसेसर अपने आप में अकेला एकीकृत परिपथ होता है ।जिसकी अपनी एक सेंट्रल प्रोसेसिंग यूनिट होती है ।सन 1970 के दशक में कैलकुलेटर में प्रयोग के तौर पर पहली बार इसका विकास किया गया था ।1970 के दशक के अंतिम सालों में इस तकनीक ने माइक्रो कम्प्यूटर के विकास का मार्गदर्शनकिया था ।

फाइबरआपटिकस

आपको यह जानकर हैरानी हो सकती है कि इस तकनीक के पीछे मौजूद विज्ञान का अध्ययन सन 1800 से किया जा रहा है ।लेकिन संचार माध्यमों के उपयोग लायक इसकी गुणवत्ता में व्यापक सुधार 1970 के बाद हुआ था ।अपनी खूबियों के चलते केबल के रूप में फाइबर आपटिक जल्दी ही श्रेष्ठ माध्यम बन गया ।इससे 100 गीगाबाइटस प्रति सेकंड से ज्यादा तेज गति से संकेत भेजे जा सकते हैं ।

आफिस साफ्टवेयर

वर्ल्ड प्रोसेसिंग और स्प्रेडशीट से हमारे कारोबार करने का तरीका बदल गया है ।1960/70 के दशक में विकसित किए गए इस साफ्टवेयर से हमारी कार्य शक्ति की विश्लेषण क्षमता और दक्षता में गुणात्मक सुधार आया है ।1979 में विजीकैलक नामक पहला स्प्रेडशीट प्रोग्राम बाजार मे आया था ।1979 में ही लांच वर्ड स्टार प्रोग्राम 1980 के दशक में सबसे लोकप्रिय वर्ल्ड प्रोसेसिंग प्रोग्राम रहा था ।

नान इनवेसिव लेजर रोबोटिक सर्जरी

हमारी दुनिया का 1980 का दशक शल्य चिकित्सा के क्षेत्र के लिए विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा है ।1987 में पहली बार नान इनवैसिव या लैपरोसकोपिक सर्जरी की शुरुआत हुई थी ।1985 में पहली बार बायोप्सी मे रोबोट का उपयोग किया गया था ।80 के दशक की शुरुआत में वैज्ञानिक समूह ने यह सत्य खोज निकाला कि कार्बनिक ऊतकों को काटने में लेजर का प्रयोग किया जा सकता है सच कहें तो इन सभी खोजों ने रोगियों के लिए सल्यचिकितसा को और भी कारगर और सुरक्षित बनाने में महती भूमिका निभाई है ।

लेखक के पी सिंह
Kpsingh 9775@gmail.com
12022018

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हम सचमुच किसके गुलाम हैं? ??

Lifehacks :     आप कहेंगे हम तो सन् 1947 में गुलामी से आजाद हो गए थे फिर यह गुलामी और आजादी वाली बात क्यों की जा रही है,  तो दोस्तों मैं आपसे जो कहना चाहता हूं वह उस गुलामी की बात नही है, बल्कि मैं उस गुलामी की बात करना चाहता हूं जिस गुलामी में न केवल भारत वासी शामिल हैं बल्कि अंग्रेजों के साथ साथ पूरी की पूरी तथाकथित विकसित दुनिया ही शामिल है ।

क्या हम गुलाम हो चुके हैं? इस सवाल का जवाब भी देने के पहले आपको लगेगा कि यह भी एक फालतू सवाल है लेकिन दोस्तों इस बार भी मैं आपसे यही कहूंगा कि यह भी झूठ नही बल्कि सोलह आना सच है कि हम और हमारी आने वाली पीढ़ी की गुलामी पूरी तरह से सिद्ध हो चुकी है इसलिए यह पूरी तरह से सच है कि हम गुलाम हो चुके हैं । हम सब सच में इसके हैं गुलाम जी हां दोस्तों हम भारतीय लोग अंग्रेजों के साथ ही पूरी दुनिया की तरह जिसके गुलाम हैं वह कोई देश या कोई दैत्य दानव नहीं बल्कि वह गुलामी है विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की गुलामी ।आप कहेंगे विज्ञान तो हमारे विकास का प्रमाण है इसमें गुलामी कहां से आई तो भाइयो बहनों जरा गौर फरमाने की कृपा करें और कहीं दूर मत जाइए केवल खुद पर एक सर्च निगाह डालिए ।आप हैरान रह जाएंगे कि सुबह से शाम और शाम से सुबह तक हमारा पल पल विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के साथ नही बीतता बल्कि यह बीतना गुलामी की तरह है जो हमें सोते जगते, उठते-बैठते हर वक्त कभी विज्ञान की छाया से दूर ही जाने नही देता ।

बढती विडम्बना और विज्ञान जी हां दोस्तों प्रेम चंद्र की कहानी मंत्र की तरह यद्यपि हम चिकित्सा सुविधा से एक तरफ वंचित नही रहते तो दूसरी तरफ यह विडम्बना नही तो और क्या है कि हम इसी विज्ञान की वजह से ही चिकित्सा की शरण में जाते हैं । क्या आपने महसूस नही किया कि हम जिस गति से अपने आप को विज्ञान का जीता-जागता दास बनाने की की सफल कोशिश कर रहे हैं वह हमारे विनाश का कारण है ।आज का आदमी इसके बावजूद यह सोच तक नही पाता कि विज्ञान हमारे लिए वह शासक बन चुका है जिसके राज्य में कभी सूरज नहीं डूबता ।। सुबह-शाम बस यही कहानी जी हां दोस्तों हम छोटे छोटे उन दैनिक कार्यों के लिए विज्ञान के मोहताज बन चुके हैं जिन्हें हमें अपने शरीर की सुरक्षा के लिए करना चाहिए लेकिन वाह रे इन्सान रोटी बनाने की मशीन, गाय से दूध दुहने की मशीन और तो और अब हम यह भी कर रहे हैं कि यदि हम अपने खाने में विटामिन शामिल नही कर पाते तो विटामिन की गोली ही बना डाली ।यानी आप को विटामिन के लिए नीबू संतरा के पास तक नही जाना पड़ेगा और आपके शरीर को संतरे नीबू से मिलने वाले तत्व गोली खाने से मिल जाएंगे हमें सच में गोली से दुख नही है हमें दुख है तो सिर्फ इससे कि हम विटामिन भी शरीर को उधार ले कर दे रहे हैं ।

निष्कर्ष और हकीकत जिन लोगों को अब भी मेरी बात समझ में न आई हो तो मैं एक बार फिर दोहराना चाहता हूं कि हम जिस गति से अपने छोटे छोटे कामों के लिए हर क्षण विज्ञान के भरोसे रहने के आदी हो गए हैं यह हमारे लिए सामान्य स्थिति न होकर विचारणीय और बेहद गंभीर स्थिति है । तो क्या करें जनाब???? अगर आप भी झुंझलाहट में मुझसे यही सवाल करना चाहते हैं और मुझे विज्ञान का दुश्मन समझते हैं तो सबसे पहले तो यह दोनों विचार त्याग दीजिए फिर सच्चाई और बिना पूर्वाग्रह के सोचिए कि यदि हम अपने दैनिक छोटे छोटे कार्य खुद करेंगे तो मेहनत जरूर लगेगी लेकिन यह भी सोचिए कि तब आपका घर बीमारी से पीड़ित घर नही कहलाएगा बल्कि सुखी सम्पन्न घर कहलाएगा ।।मुझे विज्ञान चाहिए लेकिन इस हद तक नही कि मुझे इसकी सुविधा ही परेशान करने वाली हो ।

धन्यवाद!

लेखक : केपी सिंह

Kpsingh9775@gmail.com

हम प्यार किससे करें?

प्यार को जानें
सवाल बड़ा ही स्वाभाविक है कि हम प्यार किससे करें? लेकिन इससे भी ज्यादा जरूरी यह है कि पहले हम यह जाने कितने आखिर प्यार होता क्या है? आजकल जिसे हम प्यार कहते हैं क्या वही प्यार है या प्यार का मतलब कुछ और होता है ।क्योंकि हम अक्सर यह भी सुनते हैं कि जमाना प्यार का दुश्मन है तो दूसरी तरफ हम यह भी सुनते हैं कि प्यार अनमोल एहसास है ।यहीं पर हमें ठहर कर कुछ सोचने की जरूरत होती है कि प्यार करने या न करने के पहले हम यह जान लें कि प्यार आखिर होता क्या है?

प्यार इसे कहते हैं?

हम जमाने की बात करें तो हमें कभी-कभी यह महसूस होता है कि एक हम उम्र विपरीत लिंग के साथी का सानिध्य ही प्यार है ।अथवा जवान जोड़े का स्वाभाविक लगाव ही प्यार होता है ।लेकिन नहीं दोस्तों प्यार यह नही होता प्यार तो कुछ और ही होता है ।प्यार एक समर्पण है जो बिना शर्त किसी के लिए भी हो सकता है ।वह कोई हम उम्र विपरीत लिंग के प्रति भी हो सकता है तो यह किसी भी व्यक्ति के लिए दिल से निकलने वाली दुआ भी हो सकता है ।क्योंकि प्यार कोई वस्तु नही बल्कि प्यार महज आप के दिल, स्वभाव या आदत का वह मानवीय पहलू होता है जो अपने एहसास मात्र से सकारात्मक ऊर्जा का विकास करता है ।प्यार कोई आकर्षण नही बल्कि प्यार अपनी अंतरात्मा को भली-भांति जानने-समझने की सात्विक प्रवृत्ति मात्र है ।

तो फिर किससे करें प्यार

इस सवाल का बेहद अजीब जवाब है और वह यह है कि प्यार हमें खुद अपने से करने की कोशिश करनी चाहिए न कि किसी और से ।इसका कारण यह है कि जब तक हम अपने आप से प्यार नही करेंगे तब तक हमें सचमुच प्यार की स्वाभाविकता का ज्ञान नही हो सकता और जब तक हमें खुद प्यार का एहसास नही होगा तो भला हम किसी और से प्यार कैसे कर सकते हैं ।हां हम तब प्यार करने का नकली एहसास जरूर कर सकते हैं मगर सच्चा प्यार हम किसी से तभी कर सकते हैं जब हमें खुद अपनी सकारात्मक ऊर्जा से लगाव होगा क्योंकि यह ऊर्जा ही हमारा और हमारे संसार का सबसे बड़ा सत्य है ।

प्यार कब करें?

प्यार कब करें यह सवाल तब पैदा होता है जब प्यार स्वाभाविक नही बल्कि कृत्रिम होता है वर्ना प्यार की उम्र या प्यार का कोई मुहूर्त नही होता ।कुछ लोग कहते हैं पहले अपना कैरियर संभालो फिर प्यार के रास्ते में चलने की कोशिश करना तो ऐसा प्यार दो लोगों के बीच शारीरिक नजदीकी तो ला सकता है लेकिन मानसिक और आत्मीय नजदीकी तब तक नही आती जब हम अपने आप से प्यार करने की कला नही सीख लेते ।

हमारा निष्कर्ष हमारा प्यार

निष्कर्ष और प्यार का तात्पर्य यह है कि हमें पहले खुद से प्यार करने की कोशिश करनी चाहिए ताकि हमें देश दुनिया और समाज की सच्चाई का एहसास हो सके ।हमें किसी और से प्यार की उम्मीद भी तभी लगाना चाहिए जब हम खुद प्यार को किसी को देने या बांटने के काबिल हो जाएं ।

धन्यवाद

लेखक :के पी सिंह
Kpsingh9775@gmail.com
Mobile 9651833983